एक ऐसा आवरण तैयार किया गया कि सामान्य कार्यकर्ता पार्टी के बड़े नेताओं से दूर होते गए। अनुशासन के नाम पर बसपाई सिपहसालारों ने ऐसे नियम बनाए कि पार्टी की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई। इतना ही नहीं, गलत रिपोर्ट पेश कर कई बडे़ दिग्गजाें को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखवा दिया गया, जबकि बाहर निकाले गए वही सूरमा दूसरे दलों से टिकट पा गए। कई तो जीतकर विधायक तक बन गए।
सैनी वर्ग के अलावा अन्य वर्गों में भी खासी पकड़ रखने वाले धर्म सिंह सैनी पिछली बार बसपा से विधायक थे। स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा से बगावत कर चुके थे। वह धर्म सिंह सैनी के घर निजी आयोजन के चलते पहुंचे तो बसपा हाईकमान को यह नागवार गुजर गया। उस दौर में जबकि भाजपा तथा सपा दूसरे दलों के मुख्य लोगों को साधने की कोशिश में थे, बसपा ने धर्म सिंह सैनी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। बसपाई थिंक टैंक और कोऑर्डिनेटर इस कदर हवा में उड़ रहे थे कि उन्हें भविष्य की आहट जरा भी सुनाई नहीं दी। धर्मवीर सैनी का कद भाजपा जानती थी। उन्हें नकुड़ से टिकट दिया और वह जीत गए।
नजीबाबाद से तसलीम अहमद बसपा के विधायक थे। एमएलसी चुनाव में उन पर वोट क्रॉस करने का आरोप लगाकर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उन्हें सपा ने टिकट दे दिया और वह भी नजीबाबाद से जीत गए। नहटौर सीट पर ओम कुमार बसपा विधायक थे। इस बार वह भाजपा से लड़े। बसपा ने उन पर भी आंखें तरेरी थी। वह भाजपा से चुनाव लड़े और बेहतर तरीके से जीत गए। लक्ष्मीनारायण छाता (मथुरा) से भाजपा से इस बार जीत गए हैं। वह भी बसपा सरकार में मंत्री रह चुके हैं। अन्य ऐसे कई नेता रहे जिन्हें बसपा ने जरा सी बात पर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। लेकिन वे दूसरे दलों से या तो टिकट पा गए या बेहतर स्थिति में दूसरे दलों में जगह बना गए।
पूर्व विधायक महावीर राणा को बसपा ने बाहर का रास्ता दिखाया तो वह बेहट से भाजपा का टिकट पा गए। हालांकि हार गए और यहां कांग्रेस जीती। लेकिन बसपा उम्मीदवार यहां तीसरे स्थान पर रहे। अब्दुल मन्नान पुराने रहे। उन्हें भी बसपा ने दरकिनार किया तो वह सपा से चुनाव लड़ गए। स्वामी प्रसाद मौर्य चुनाव जीते ही हैं। मेरठ की बात करें तो यहां एमएलसी रहे लोेकेश प्रजापति को बाहर का रास्ता दिखाया गया। यह भी नहीं बताया गया कि कारण क्या था? उन्होंने भाजपा ज्वाइन की तो भाजपा ने उन्हें स्टार प्रचारक की सूची में शामिल कर लिया और वे हेलीकॉप्टर में सवार होकर चुनाव प्रचार करते रहे।
ये आपसी राजनीति और फूट ले डूबी
बसपा ने पूरे सूबे में मुख्य रूप से कमान दो बड़े मुस्लिम नेताओं को दे रखी थी। पश्चिमी यूपी में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को लगाया, तो पूर्वी उप्र में बाबू मुनकाद अली को। मुनकाद तो फिर भी कहीं न कहीं टीम को साधते रहे। लेकिन पश्चिमी उप्र में नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर अंदरूनी राजनीति करने के आरोप लगते रहे। पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट और बसपा को मजबूत करने के बजाय केवल उन लोगों को पार्टी से बाहर करवाने में ताकत लगाते रहे जो उन्हें या तो मुनकाद पक्ष के लगे या कहने में नहीं चले। इससे कार्यकर्ताओं के भीतर रोष बढ़ता गया। खासतौर पर दलित वोटर क्षुब्ध होते चले गए। वेस्ट यूपी में अतर सिंह राव को भी लगाया गया। लेकिन वह भी पार्टी कार्यकर्ताओं को साधने के बजाय कैंट में कमजोर प्रत्याशी उतारकर चर्चा में आ गए। वह भी तब, जबकि काफी कार्यकर्ता इसे अजीब कदम बता रहे थेे। चर्चा तो यह भी रही कि बामसेफ पदाधिकारियों ने विरोध जताया था। लेकिन किसी की नहीं सुनी गई। कैडर बेस्ड वर्क भी बेहद कमजोर रहा।
कई-कई टिकट बदलवाए
बसपा में टिकट वितरण का खेल जग जाहिर है। कार्यकर्ता का राजनीतिक वजूद देखने के बजाय यह देखा जाता है कि उसकी ‘फाइल’ कितनी मोटी है। बसपाई कोऑर्डिनेटर इस ‘फाइल’ की मोटाई देखकर ही बसपा सुप्रीमो को रिपोर्ट भेजते रहे और टिकट बदलवाते रहे। वेस्ट यूपी में ही जब मन चाहा, टिकट बदल दिया गया। चाहे सरधना रहा हो या कैंट या फिर शहर। टिकट बदले गए। कई उम्मीदवारों ने तो ‘फाइल’ की बढ़ती जा रही मोटाई को देखकर हाथ जोड़ लिए और खुद ही पीछे हट गए। ये ऐसे कारण रहे जिन्होंने हाथी को जमीन दिखाने में अहम भूमिका अदा की। इतना ही नहीं, पलक झपकते ही पदाधिकारियों को बदल दिया गया। जैसे मेरठ के जिलाध्यक्ष सुनील जाटव को अचानक हटा दिया गया।