फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

‘पत्थर’ हो गए नेताजी के वायदे

Wed, 07 Sep 2016 01:59 AM IST
अमर उजाला ब्यूरों
विज्ञापन
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
बडे़ अरमानों से शिलान्यास के लिए पत्थरों पर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में खुदवाया। लेकिन ये अरमान धरे ही रह गए। पत्थरों पर केवल कारीगरों का पसीना बहा और वे दुकानों में ही धूल फांक रहे हैं। ऐसी तमाम शिलाएं दुकानों में मौजूद हैं जो बनवाने के बावजूद उठवाई ही नहीं गई। दुकानदार आज भी उनका इंतजार कर रहे हैं कि नेताजी आकर अपना पत्थर ले जाएं और उनका बाकी भुगतान कर दें।
विज्ञापन

विकास योजनाओं को नई दिशा देने की कवायद लगातार चलती रही है। हर क्षेत्र में जनप्रतिनिधि अपने-अपने स्तर के विकास कार्यों को कराते रहे हैं। खासतौर पर निर्माण कार्य प्राथमिकता में रहते हैं। मसलन, सड़क निर्माण, नाला, खड़ंजे, नालियां, पुलिया आदि का निर्माण बड़े मायने रखता है। जनप्रतिनिधियों का इसी पर जोर रहता है कि  वे इसी तरह के विकास काम कराएं।

पत्थर तय करते हैं वजूद
विकास कार्य कराया हो और उसका शिलापट न लगा हो, यह हो नहीं सकता। दरअसल शिलापट ऐसा मजबूत आधार है जो प्रतिनिधि का न केवल प्रचार करता है बल्कि क्षेत्र में उसका वजूद भी तय करता है। जिस नेता के जितने ज्यादा पत्थर क्षेत्र में लगे हों, उसकी पकड़ उतनी ही मजबूत मानी जाती है। यही कारण है कि निर्माण कार्य पूरा होने या शुरू होने पर शिलान्यास किया जाता है। कई बार तभी शिलापट लगा दिया जाता है तो कई बार काम पूरा होने पर। नेताजी शान से इसका अनावरण करते हैं, वह भी भव्य कार्यक्रम में। यही कारण है कि पहले ही आकर्षक पत्थर बनाया जाता है।
विज्ञापन


अब पत्थर कर रहे इंतजार
मेरठ में छतरी वाले पीर के पास शिलापट तैयार करने का पुराना कारोबार है। लाइन से कई दुकानों में काम होता है। हैरत की बात यह है कि यहां दशकों पुराने शिलापट मौजूद हैं। इन्हें लिखवाया तो गया, पर लेने कोई नहीं आया। थोड़ा सी रकम एडवांस में जमा की और बाकी शिलापट के साथ, पर बाद में इन्हें लेने कोई नहीं आया। दरअसल, शिलापट तो तैयार करवा लिया गया पर वहां विकास कार्य हो ही नहीं पाए। यदि हुए भी तो विवादों में फंस गए। ऐसे तमाम शिलापट इन दुकानों में मौजूद हैं और दुकानदार इंतजार कर रहे हैं कि नेताजी इन्हें ले जाएं ताकि उनकी दबी रकम निकल सके। वर्तमान रेट की बात करें तो 35 रुपये फुट और इतनी ही लिखाई के हिसाब से काम हो रहा है। अच्छा पत्थर दो से तीन हजार रुपये में पड़ता है। फैजान कहते हैं कि क्वालिटी बढ़िया होगी तो पत्थर पर अमिट छाप भी उतनी ही बेहतर बनेगी।

ऐसे ऐसे पत्थर जोह रहे बाट
वर्ष 2001-2002 का सांसद चंद्र विजय सिंह का सड़क निर्माण का एक पत्थर यहां रखा है, जो लगा ही नहीं। हाजी याकूब कुरैशी का भी वर्ष 2004-2005 का एक पत्थर यहां रखा है। एक पत्थर वर्ष 2003 का है जो हाजी शाहिद अखलाक का है। विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल का भी एक पत्थर यहां शोभा बढ़ा  रहा है। जगदीश नारायण राय का ऐसा ही पुराना पत्थर यहां मौजूद है। वर्ष 2014 का एक पत्थर वर्तमान कैबिनेट मंत्री आजम खान का भी है। ऐसे तमाम नेताओं के शिलापट यहां इंतजार में हैं कि वे कब लगें।
राहत भी है
चुनावी साल में पत्थर लगाने का काम जोरों पर चल रहा है। ऐसे में इन दुकानों पर बड़े ऑर्डर आए हैं। आजम खान का ही एक दुकान पर पचास शिलापट लगाने का ऑर्डर आया है। ऐसे में दुकानदार कहते हैं कि राहत यह है काम चल रहा है। इस आखिरी साल में लगता है कि पुराने नुकसान की भरपाई की जा सकेगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें