किठौर नगर पंचायत क्षेत्र के आसपास रार्धना आदि गांवों से जुड़े जिला पंचायत के वार्ड 31 के चुनाव को लेकर बेहद तनाव की स्थिति है। हालांकि इस वार्ड से अभी बसपा ने अपना समर्थन किसी उम्मीदवार को नहीं दिया है। लेकिन बृहस्पतिवार को राज्यसभा सदस्य बाबू मुनकाद के भाई साजिद ने वसीम जब्बार का पर्चा दाखिल कराकर यह साफ कर दिया कि यहां मुकाबला शाहिद मंजूर बनाम बाबू मुनकाद होने जा रहा है। हालांकि कहा यह जा रहा है कि बसपा एक दो दिन में वसीम को ही अपना समर्थन देने की घोषणा करेगी। अहम यह है कि पर्चा भरते ही इस पक्ष के लोगों ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी उन्हें धमका रहे हैं कि पर्चा भरा तो ठीक नहीं होगा।
वार्ड 31 में दो दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। यहां सपा सरकार के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर के पुत्र नवाजिश भी चुनावी कुरुक्षेत्र में उतरने की तैयारी में हैं, तो सामने बसपा के राज्यसभा सदस्य बाबू मुनकाद पक्ष के उम्मीदवार ताल ठोंक रहे हैं। बृहस्पतिवार को उनके भाई साजिद अली, नगर पंचायत किठौर चेयरमैन मतलूब गौड आदि ने गांव रार्धना के पूर्व प्रधान जब्बार के पुत्र वसीम जब्बार का नामांकन पत्र दाखिल कराया।
माना जा रहा है कि नवाजिश भी शनिवार को अपना पर्चा दाखिल कर देंगे। यह राजनीतिक अदावत यहां बेहद दिलचस्प मुकाबला कराएगी। रार्धना, ललियाना, सौदत्त, नवल, भगवानपुर, बौंद्रा, भड़ौली, अतलपुर, सौंपरी समेत 12 गांवों का यह वार्ड इस चुनाव के लिए पिछले एक साल से तैयार किया जा रहा है। जनता के बीच अपनी- अपनी पकड़ मजबूत की जा रही है। किठौर के नगर पंचायत चुनाव में यह कशमकश पूरे चरम पर थी। मुनकाद पक्ष से मतलूब तो मंजूर पक्ष से शम्स परवेज चुनाव लड़े थे और मात्र 12 वोटों से मतलूब ने यह चुनावी किला फतह कर लिया था।
यह टीस कहीं न कहीं मंजूर पक्ष के लोगों में है और इसकी भरपाई करने की पूरी कोशिश होगी। उधर, मुनकाद पक्ष अपनी इस ठसक को बरकरार रखने का पूरा प्रयास करेगा। हालांकि वसीम को बसपा ने अभी अपना समर्थन नहीं दिया है। पर माना जा रहा है कि वसीम को ही हरी झंडी दी जाएगी। बृहस्पतिवार को पर्चा भरते ही मुनकाद पक्ष ने राजनीतिक चौसर पर चाल चल दी। जब्बार आदि ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी उन्हें धमका रहे हैं। पहले भी फर्जी मामलों में फंसा चुके हैँ और अब फिर कहा जा रहा है कि चुनावी रण से हट जाओ वरना अंजाम घातक होगा। यहां मुकाबला सीधा माना जा रहा है और दूसरे उम्मीदवारों तथा दलों के सामने यह चुनौती है कि वे कैसे इस मुकाबले में अपने आप को मजबूती से खड़ा रख पाते हैं।