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पैकफेड घोटाला में इंजीनियरों की भूमिका संदिग्ध

Tue, 06 Dec 2016 02:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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पैकफेड (उत्तर प्रदेश विधायन एवं निर्माण सहकारी संघ) से जुड़े घोटाले में कई इंजीनियरों की भूमिका संदिग्ध है। छानबीन के तहत पता चला कि बिल्डिंग, कंस्ट्रक्शन मटीरियल खरीदने के लिए अपने का सहारा लिया गया। वाणिज्य कर विभाग की राडर पर आए ऐसे ही डीलरों की कुंडली खंगालने पर पता चलता है कि उनका संबंध किसी न किसी रूप में पैकफेड में कार्यरत इंजीनियर से है।
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लक्ष्मी इंटरप्राइजेज नाम की फर्म की फाइल खोली गई तो खुद ब खुद साफ होता चलता गया कि इसका संचालन पैकफेड में सेवारत एक इंजीनियर के रिश्तेदार द्वारा किया जा रहा है। उसी से सबसे ज्यादा सामान खरीदा गया। करीब आठ करोड़ की खरीद के नाम पर 82 लाख रुपये की टैक्स चोरी के घोटाले में कई चिकित्सक सेल्स टैक्स विभाग की रडार पर आए हैं। क्योंकि लक्ष्मी इंटरप्राइजेज के साथ ही लक्ष्मी ट्रेडर से भी जुड़ी है। रिकार्ड बताता है कि दोनों फर्म एक ही परिवार के सदस्यों द्वारा संचालित हैं। यह पैकफेड से जुड़े इंजीनियर के रिश्तेदार है। दरअसल ट्रेड लाइसेंस यानी पंजीकरण हासिल करने के लिए डीलरों द्वारा लगाई गई गारंटी (बिजली बिल, हाउस टैक्स आदि) को देखा गया तो दोनों की एक ही थी। वहीं, पैकफेड का इंजीनियर जहां कहीं भी तैनात रहा है, उसने वहीं से इन दोनों फर्मों से सामान खरीदा। हालांकि सारे मामले पर वाणिज्य कर विभाग अभी अधिकृत तौर पर बताने से बच रहा है। इसके अतिरिक्त करीब 30 डीलर भी शक  के दायरे में है, क्योंकि उनका भी किसी न किसी रूप में इंजीनियरों से संबंध बताया जा रहा है जिसको विभाग छानबीन में जुटा है।

समाधान योजना लेती है खरीद शुरू  
जांच के रिकार्ड से कुछ दूसरे चौंकाने वाले तथ्य भी सामने आये हैं जो बताते हैं कि पूरी खरीद सरकार को चूना लगाने और हेराफेरी करने की नीयत से की गई। जिन भी डीलरों ने समाधान योजना हासिल की उन्होंने उसी दिन से पैकफेड को सामान बेचना शुरू कर दिया। क्योंकि बिल पर लिखी गई तिथि और वाणिज्य कर विभाग की तरफ से समाधान योजना दिये जाने की तिथि एक हैं, जो यह दर्शाती है कि पैकफेड के इंजीनियर और विभागीय अधिकारी सारे मामले को जानते थे। क्योंकि पैकफेड की तरफ से डीलरों का एक भी बिल नहीं रोका गया, उल्टे सामान की डिलीवरी होने के कुछ ही दिन बात पेमेंट कर दिया गया। रिकार्ड के अनुसार 80 फीसदी डीलरों को पेमेंट करने में एक से दो हफ्ते का ही वक्त लगा, जबकि बिना समाधान योजना वाले 20 फीसदी डीलरों का पेमेंट महीनों बाद किया गया। इसलिए कई अधिकारी सरकारी धन का गलत तरीके से इस्तेमाल करने में फंसे हैं।
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