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प्रदूषण से बढ़ रही स्व: मग्नता

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मेरठ। खाद्य पदार्थों में मिलावट और वायु प्रदूषण आने वाले पीढ़ी के लिए एक बड़ा खतरा बनकर सामने आ रहा है। देश में ढाई करोड़ लोग मानसिक बीमारी जिसमें स्व:मग्नता (ऑटिज्म) से ग्रस्त हैं। इस बीमारी को बॉलीवुड मूवी ‘बर्फी’ और ‘माई नेम इज खान’ जैसी फिल्मों में भी दिखाया गया है। यह बीमारी बच्चों में जन्म से होती है तो कुछ दुर्घटना के बाद इस बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं। न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट की उप निदेशक डॉ. नंदिनी गोकुलचंद्रन का दावा है कि न्यूरो रीजेनरेटिव ट्रीटमेंट से इस बीमारी का उपचार संभव हैं। ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चों का मानसिक विकास अन्य बच्चों की तुलना में बहुत धीमी गति से होता है। यह जन्म के दौरान मस्तिष्क में होने वाली क्षति के कारण होता है। डॉ. नंदिनी ने दावा किया कि वे अब तक 8,500 लोगों का सफल इलाज कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि डॉक्टर्स की टीम के द्वारा 21 सितंबर को मेरठ में कैंप लगाया जाएगा।
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‘स्टेम सेल थिरेपी’ से इलाज संभव
मनुष्य के शरीर की कोशिकाएं ही शरीर में हुई बीमारियोें को ठीक कर सकती हैं। इसी प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए ‘स्टेम सेल थिरेपी’ पर कार्य किया गया। बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति की रीड की हड्डी में मौजूद मज्जा में से स्टेम सेल निकाले जाते है। इन्हें इंजेक्शन के माध्यम से प्रभावित क्षेत्र में डाला जाता है। इससे मस्तिष्क में मौजूद कोशिकाएं रिपेयर हो जाती हैं।
मरीजों की संख्या बढ़ी
देश में मानसिक बीमारी ‘डाउन सिंड्रोम’ से हर साल 23000 बच्चे प्रभावित होते हैं। प्रदूषण इसका बड़ा कारण हैं। मां की उम्र अगर 35 साल से अधिक है तो होने वाले बच्चे में बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। इस बीमारी को जीन दोष भी कहा जाता है।
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शहर की बच्ची का दिया उदाहरण
शहर मेरठ रहने वाली एक बच्ची डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त थी। बच्ची के माता पिता ने बीमारी और इलाज के बाद हुए फायदों के बारे में बताते हुए कहा कि बच्ची जन्म के बाद कुछ समय बाद रोई थी। पांच माह बाद उन्हें बीमारी का पता लगा। अब ‘स्टेम सेल थिरेपी’ से इलाज चल रहा है।
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