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Meerut News: नाक, कान और गला...प्रदूषण कर रहा हमला

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नाक, कान और गला...प्रदूषण कर रहा हमला
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- जिला अस्पताल में पिछले साल ईएनटी विभाग में आए 15 हज़ार मरीज़ों के अवलोकन में हुआ खुलासा

मेरठ। प्रदूषण नाक, कान और गले को बेहद नुकसान पहुंचा रहा है। ध्वनि और वायु प्रदूषण खासकर कानों को न सिर्फ गंभीर बीमारियां दे रहे हैं, बल्कि सुनने की क्षमता को भी काफी कम कर रहा है। यह खुलासा पिछले एक जनवरी 2022 से 31 दिसंबर 2022 तक जिला अस्पताल की नाक-कान-गला रोग (ईएनटी) ओपीडी में आए 15 हजार मरीजों पर की गई स्टडी में हुआ है।
इनमें से करीब 25 प्रतिशत मरीज ऐसे निकले, जिनके सुनने की क्षमता प्रभावित थी। इसके अलावा उन्हें टिनिटस (कान बजना) बीमारी निकली है। इनमें सबसे ज्यादा मरीज 20 से 50 साल उम्र के बीच के थे। इन मरीजों में नाक की एलर्जी और गले के इंफेक्शन की भी शिकायत थी। सामान्य तौर पर यह बीमारी पहले 60 साल की उम्र के बाद होती थीं, मगर अब युवा अवस्था में ही यह चपेट में ले रहा है।
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इस तरह हो रहा कानों पर वार
तेज स्वर में संगीत सुनने और ईयरफोन पर घंटों गाना सुनने के कारण कान की बाहरी परत क्षतिग्रस्त हो जाती है और इस कारण सुनने की क्षमता कम हो जाती है। कानों में दर्द होना, धीमी आवाजें न सुनाई देना, किसी तरह का दबाव महसूस होना, सूजन आना या कान से तरल पदार्थ का बहना, कानों की प्रमुख समस्याएं निकली हैं। 20 से 50 साल आयु वर्ग के करीब 80 प्रतिशत लोग मोबाइल फोन का अधिक प्रयोग करते हैं, जिनसे उन्हें कानों की समस्याएं हो रही हैं। वाहनों के बढ़ते उपयोग से ध्वनि प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ गया है, जो कानों को नुकसान पहुंचा रहा है।
जिला अस्पताल ईएनटी डॉ. बीपी कौशिक ने बताया कि मानक से ज्यादा ध्वनि प्रदूषण तो सीधे कानों को प्रभावित करता है, वहीं वायु प्रदूषण से साइनोसाइटिस, जुकाम और एलर्जी होती है, जो बाद में कानों को बहुत ज्यादा प्रभावित करती है। जैसे-टिनिटस बीमारी जुकाम के बाद प्रभावित करती है।
मेडिकल के ईएनटी डॉ. वीपी सिंह ने बताया कि जुकाम में मरीजों की नाक बहती है। नाक से कान के बीच स्थित यूस्टेकियन ट्यूब में नाक से पानी चला जाता है। इस पानी के कारण मध्य कान में संक्रमण हो जाता है। कई बार कफ के कारण ट्यूब ब्लॉक हो जाता है। इससे कान का संक्रमण होने के साथ ही सुनने की क्षमता भी मरीज की कम हो जाती है।
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ध्वनि और वायु प्रदूषण निकला सबसे बड़ा कारण
जिला अस्पताल में ऑडियो मीटर के जरिए मरीजों की सुनने की क्षमता मापी जाती है, जिसमें पता चला कि बड़ी संख्या में युवा प्रदूषण (वायु-ध्वनि) के कारण कानों की बीमारियों और सुनने की क्षमता कम होने के शिकार हो रहे हैं।

यह लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान
कानों में संक्रमण के चलते दर्द का उभरना सबसे पहला लक्षण होता है।
- कान में भारीपन महसूस होना।
- मवाद होना, बुखार, कानों का बहना।
- सोने में परेशानी आना, सिरदर्द, भूख न लगना।
- कानों में घंटी की आवाज सुनाई देना।
- चक्कर आना, उल्टी होना, सुनने की क्षमता का कमजोर होना।

यह हैं सुनने की क्षमता के मानक
- 15 से 20 डेसीबेल तक की आवाज से कान को कोई नुकसान नहीं होता है
- 60 से 65 डेसीबेल के बाद कान को आवाज चुभने लगती है
- 115 डेसीबेल की आवाज से कान का पर्दा फट सकता है
- 85 से 120 डेसीबेल आवाज पटाखे की होती है
- 85 से 115 डेसीबेल आवाज हेडफोन का होता है
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