ज्योतिषाचार्य विनोद त्यागी ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों का पुण्य केवल निर्जला एकादशी के व्रत से प्राप्त हो जाता है। महाभारत काल में भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास के कहने पर यह व्रत किया था। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।
लोक कथाओं में वर्णित है कि देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए एक हजार वर्षों तक निर्जल रहकर कठोर तप किया था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन देकर अपनी निष्काम भक्ति का वरदान प्रदान किया।
भगवान विष्णु की पूजा अधिक फलदायी
आचार्य चंडी प्रसाद ने बताया कि भगवान विष्णु की पूजा, विष्णु चालीसा का पाठ, तुलसी पूजन और दीपदान अत्यंत फलदायी रहेगा। पीपल के वृक्ष के नीचे घी का दीपक जलाना, तुलसी माता का पूजन और पंचामृत से भगवान विष्णु का अभिषेक भी शुभ माना गया है।
इस तिथि पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। इस दिन जल से भरे पात्र, पंखा, वस्त्र, छाता, फल, अन्न तथा शीतल पेय पदार्थों का दान करने का विधान है। कई स्थानों पर श्रद्धालु राहगीरों के लिए शरबत वितरण, प्याऊ और भंडारे का आयोजन भी करते हैं।