याद कीजिए एनसीसी की एयर विंग। स्लेटी वर्दी में कदमताल करते कैडेट्स। कभी एयरो मॉडिलिंग में जौहर दिखाते तो कभी विशेषता कंटीन्यू ड्रिल में एक-दूसरे से तालमेल बैठाते हुये लेफ्ट-राइट करते। प्रदेश के सिर्फ आठ जिलों में संचालित है एनसीसी की यह विंग, जिनमें मेरठ भी शामिल है।
यहां पूरे जिले में एकमात्र परीक्षितगढ़ इंटर कॉलेज में चल रही है। 1967 में इस विंग की ब्रांच खुली थी। 1988 तक इसका स्वर्णिम काल रहा। इसके कैडेट्स आज सेना, एयर फोर्स, दूतावास और आईपीएस अफसर तक हैं, जो देश की सेवा कर रहे हैं। विंग की खासियत पर एक रिपोर्ट।
ड्रिल देखकर हैरान होते थे लोग
परीक्षितगढ़ के गांधी स्मारक देव नागरिक इंटर कॉलेज में पीटीआई सरदार सिंगारा सिंह को विंग का ऑफिसर बनाया गया था। सरदार सिंग आर्मी से रिटायर थे उन्होंने अपने दम पर विंग में दो कार्यक्रम और जोड़े। पहला कंटीन्यू ड्रिल और दूसरा एयरो मॉडिलिंग। कंटीन्यू ड्रिल में आर्मी परेड के वो सभी मूव शामिल थे, जो परेड के दौरान होते हैं। एक ही कमांड पर यह सारे मूव कैडेटस किया करते थे। उनकी कदम ताल को देखकर लोग हैरान हो जाते थे।
अपने दम पर शुरू की एयरो मॉडिलिंग
सरदार सिंगारा सिंह का जुनून ही कहा जाएगा उन्होंने आगरा सेंटर जाकर एयरो मॉडिलिंग की ट्रेनिंग ली और उसके बाद अपने व्यक्तिगत खर्च पर अपने ट्रूप में इसे शुरू किया। कैडेट्स को चॉक ग्लाइडर, कंट्रोल लाइन एअर क्राफ्ट और फ्री फ्लाइट न केवल बनाने बल्कि उन्हें उड़ाने की भी ट्रेनिंग दी।
ये थी एयरो मॉडिलिंग
चॉक ग्लाइडर बहुत ही हल्की लकड़ी से तैयार होता है। हालांकि इसके लिए तैयार किट आती है। जिसे शेप देकर और उसका वजन बैलेंस कर हवा में तैरने लायक तैयार किया जाता है। इसे उड़ाने के दो तरीके हैं। पहला तरीका दो अंगुलियों के बीच फंसाकर ऊपर की तरफ फेंका जाए, तो यह कई मिनट तक हवा के साथ उड़ान भरता है। दूसरा गुलेल के जरिये उड़ाया जाता है। इस चॉक ग्लाइडर में नीचे की तरफ कट होता है, जिसे गुलेल की रबर में फंसाकर उसे पीछे की तरफ खींचते हुए हवा में छोड़ा जाता है। यह ग्लाइडर ज्यादा ऊंचाई और देर तक हवा में उड़ता है।
इंग्लैंड से मंगाए थे फ्लाइट इंजन
कंट्रोल लाइन और फ्री फ्लाइट इंजन बेस एअर क्राफ्ट मॉडल हैं। इनके इंजन उस समय विशेष रूप से इंग्लैंड से मंगाये जाते थे। हालांकि अब भारत में भी मिलते हैं। हल्की लकड़ी से तैयार इस मॉडल में आगे की तरफ इंजन फिट किया जाता था, जिसमें सबसे आगे दो पंखुड़ियों वाला पंखा होता था। बराबर में इंजेक्शन लगाने वाली प्लास्टिक की सीरिंज इसका फ्यूल टैंक हुआ करती थी। लकड़ी के ढांचे पर पतंगी कागज चिपकाया जाता था।
इस मॉडल के इंजन को आगे लगे पंखे को अंगुली के प्रेशर से घुमाकर स्टार्ट करके स्पीड कंट्रोल करते हुए हवा में छोड़ दिया जाता था। काफी ऊंचाई पर घूमते हुए जाते हुए यह फ्री फ्लाइट देर तक हवा में उड़ता रहता था और जब इसका फ्यूल खत्म हो जाता था, तब धीरे धीरे खुद ही किसी स्थान पर नीचे उतर आता था।
प्रदेश में दो दशक तक रही अव्वल
एनसीसी एअर विंग प्रदेश में दो दशक तक शीर्ष पर रही। एनुअल ट्रेनिंग कैंप में एयरो मॉडिलिंग परेड, स्पोर्ट्स, किट ले आउट और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में यह ट्रूप हमेशा प्रथम आता रहा। इसके आगे आगरा, कानपुर और लखनऊ जैसे शहरों के ट्रूप कभी टिक नहीं पाए। मुजफ्फरनगर, वाराणसी, मथुरा और झांसी में ये तो सिर्फ नाम के थे।
अब खो गई पहचान
सरदार सिंगारा सिंह 1988 में रिटायर हो गए। इसकी कमान सरदार संतोष सिंह को सौंप दी गई। संतोष सिंह जनवरी 2010 तक इसके चीफ ऑफिसर रहे। उन्होंने कंटीन्यू ड्रिल को बरकरार रखा, लेकिन एयरो मॉडिलिंग पूरी तरह दम तोड़ गई। उन्होंने सरदार सिंगारा सिंह से सीखने का भी प्रयास नहीं किया।
2010 से 2012 तक योगेश त्यागी और 2012 से वर्तमान में देवेंद्र यादव इसके ऑफिसर हैं। लेकिन इन दोनों के कार्यकाल में यह एअर विंग कंटीन्यू ड्रिल को भी बरकरार नहीं रख सका। 1997 तक सरदार सिंगार सिंह जब तक जीवित रहे, यह उम्मीद बनी रही कि उनकी सहायता से शायद इस कला को दोबारा विकसित किया जाएगा, लेकिन उनके देहांत के बाद सारी उम्मीदें दम तोड़ गईं।
कालेज की राजनीति भी जिम्मेदार
कालेज में 1986 के दौरान ऐसी राजनीति हुई कि सरदार सिंगारा सिंह को किनारे कर दिया गया। वह रिटायर हुए तो उसके बाद उनके द्वारा तैयार इस गौरवपूर्ण एअर विंग की धरोहर को बचाने का कोई प्रयास नहीं हुआ। यही नहीं सरदार सिंगारा सिंह ने अपने पैसे जो दर्जनों मॉडल तैयार किये थे, उन्हें संभालकर तक नहीं रखा गया। आज चार मॉडल एक कोने में पड़े हुए हैं, जिनके इंजन भी गायब हो चुके हैं।
शिक्षा विभाग भी उदासीन
जिला और मंडल स्तर पर आयोजित होने वाली रैलियों में एनसीसी एअर विंग का शो हुआ करता था। शिक्षा विभाग विशेष रूप से इसे आमंत्रित करता था। लेकिन इस विंग को बचाने में शिक्षा विभाग की उदासीन रहा।
वर्तमान में ये है स्थिति
वर्तमान में एनसीसी एअर विंग का ऑफिस कबाड़ घर जैसा बन गया है। ऑफिसर देवेंद्र यादव का कहना है कि पिछले तीन साल से इसकी यूनिफार्म तक यूनिट से नहीं मिली है। एयरो मॉडिलिंग और कंटीन्यू ड्रिल क्यों खत्म हुई इस पर वह जवाब नहीं दे पाए। देवेंद्र यादव को पता ही नहीं है कि पहले होता क्या था।
कॉलेज में अभी नये प्रधानाचार्य की नियुक्ति की गई है। एनसीसी एअर विंग का होना वास्तव में गौरवपूर्ण है। मेरा व्यक्तिगत प्रयास अब इस विंग को दोबारा उसके गौरव को प्राप्त कराना होगा।
- श्रवण कुमार यादव, जिला विद्यालय निरीक्षक