घर में सांझी बनाने की जिद करते हैं बच्चे
अंशिका, कासवी, भव्या, सलोनी, पलक, पारिसा आदि बच्चे मम्मी से घर पर सांझी बनाने की जिद करते हैं। सांझी के साथ सजाने के लिए टिकड़ी, तोते, सांझी का भाई, बाजे वाला, मोर, बामनी आदि बनाने के लिए कई दिन पहले तैयारियां शुरू हो जाती थी हैं। गांव में हस्त निर्मित सांझी को किशोरियों के लिए कला सीखने की पहली सीढ़ी मानी जाती थी।
रेडीमेड सांझी की खूब हो रही बिक्री
घिस्सुखेड़ा गांव के दिनेश प्रजापति आसपास गांव और कस्बे में रेडीमेड सांझी बेचने के लिए सुबह मोपेड पर निकल जाते है। कहते है 60 से 100 रुपये तक सांझी बेच रहे है। हकीमपुरा रोड़ पर चाक चलाने वाले विनोद प्रजापति का कहना है कि मिट्टी की किल्लत और मौसम गड़बड़ाने से बाजार से खरीदकर ही सांझी बेची है। दुकानदार आलोक कुमार कहते है कि परंपरा में बदलाव के कारण ज्यादातर महिलाएं बाजार से सांझी खरीदकर घरों में सजाने लगी है।
सांझी की आरती से घर-आंगन में गूंजेगी भक्ति धारा
आरता री आरता...सांझी माई आरता...दियों की टिमटिमाती थालियां लेकर घरों में बालिकाएं आरती करने पहुंचती है। सांझ ढलने पर घरों में लड़कियों की टोलियां घरों से निकलती है। घर देवी मां की भक्ति में लीन हो जाता है। किशोरियों और बच्चों को इन दिनों का बेसब्री से इंतजार रहता हैं।