सब मिलते, गाते थे गीत
मूलत: लावड़ निवासी सरोज कहती हैं कि सांझी केवल मान्यता या पूजन नहीं था, बल्कि हम लोगों के लिए आपस में मिलने, गीत गाने, बतियाने का माध्यम था। नवरात्र से पहले अमावस्या को हर घर के बाहर दीवार की सफाई होती। दीवार लीपकर चूल्हे की पीली मिट्टी या गोबर से सांझी बनाते थे। उसे चूड़ी, कांच, बिंदी, कौढ़ी, सितारे, आटा, रोली, गेरु, रुई, धागे से सजाते। फूल पत्ते सजाते। नौ दिन सुबह, शाम सांझी की पूजा होती। गांव की औरतें, लड़कियां मिलकर गीत गीत गाती थीं।
समय बताती थी सांझी
मवाना से ताल्लुक रखने वाली उषा अब मेरठ में रहने लगी हैं। वह कहती हैं कि अब शहरों में पक्के, छोटे घर हैं। आंगन है नहीं तो सांझी कहां सजाएं। घर के अंदर ही या मंदिर में लोग बाजार से मिट्टी की सांझी लगाकर सजा लेते हैं। नियम तो यह है कि घर के बाहर दीवार, आंगन में सांझी रखें। मंदिर के पास सांझी न रखें। सांझी एक तरह से समय सूचक थी। सूर्योदय से पहले लड़कियां सांझी पूजा करके पूरे गांव में भजन गाती थीं। लोगों को जगाया करती थीं।
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