शहर में सफाई भले ही 20 प्रतिशत हो रही हो, लेकिन नगर निगम के खजाने की भरपूर सफाई हो रही है। ठेका और स्थायी सफाई कर्मचारियों के वेतन के नाम पर निगम के खजाने से सालाना करीब 60 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद शहर का 80 प्रतिशत एरिया रोजाना गंदा छोड़ दिया जाता है। खुद महापौर शहर की प्रॉपर सफाई न होने को लेकर कई बार नाराजगी जता चुके हैं, लेकिन अधिकारी यही दावा करते हैं कि व्यवस्था में सुधार है।
ऐसे हो रहा खुला खर्च
शासनादेश के मुताबिक नगर निगम प्रशासन ने निगम में कार्यरत सभी संविदा सफाई कर्मचारियों को विगत नवंबर माह से एक ठेकेदार के अधीन कर दिया। करीब चार माह से निगम सफाई कर्मियों को आउट सोर्सिंग पर वेतन दे रहा है। ठेके पर यह सफाई कर्मी ऑन रिकॉर्ड करीब 2215 हैं। एक कर्मचारी को प्रति माह 75 सौ रुपये चेतन मिलता है। जो सभी के मिलाकर प्रति माह करीब 1.66 करोड़ रुपये बैठता है। इस पर भी आउट सोर्सिंग पर सफाई के नियमों के चलते निगम को 14.50 प्रतिशत सर्विस टैक्स केंद्र सरकार को देना होगा, जो करीब 24 लाख रुपये प्रति माह बैठता है। इसके अलावा निगम में करीब एक हजार स्थायी सफाई कर्मी हैं। जिनको प्रति माह करीब तीन करोड़ रुपये वेतन मिलता है। ठेका और स्थायी सफाई कर्मियों को मिलाकर निगम हर माह करीब पांच करोड़ रुपये सफाई के नाम पर खर्च कर रहा है।
लेकिन शहर कहां होता है साफ
शासन की मंशा तो यह थी कि ठेका व्यवस्था से कुछ राहत मिलेगी, लेकिन यहां तो शहर की सफाई व्यवस्था ही पटरी से उतर गई है। दरअसल जब तक ये कर्मचारी निगम में संविदा पर थे तो उन्हें स्थायी होने की उम्मीद थी, लेकिन अब तो यह उम्मीद भी खत्म हो चुकी है। हाल पहले भी यही था और अब भी। यानी इन्हें पहले भी भुगतान मिल रहा था और अब भी, लेकिन बस सफाई ही नहीं हो रही। कर्मचारी ठेकेदार का है या सरकार का, सफाई करने जा रहा है या नहीं, यह देखने की किसी को फुर्सत नहीं है।
टैक्स की टेंशन अलग से
निगम ने करीब पांच साल से भारत सरकार को सर्विस टैक्स का भुगतान नहीं किया है। करीब 24 लाख रुपये के हिसाब से यह राशि करीब 1.20 करोड़ रुपये बैठती है। जिसको देने से ही निगम की व्यवस्था डगमगाने की स्थिति में आ जाएगी।