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यहां देखने को मिली हिंदू-मुस्लिम एकता की नई मिसाल

Wed, 08 Feb 2017 12:12 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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70 वर्षीय नानू की मौत के बाद दाह संस्कार ने हिंदू-मुस्लिम एकता की एक नई मिसाल पेश की है। कई लोग भाईचारा बनाए रखने की कोशिशों से भले ही परहेज करते हों। लेकिन नानू ने अपनी जिंदगी के 45 साल मुस्लिम परिवार में रहकर काट दिए। न खुद शादी की और न ही अपनों की परवाह। मंगलवार दोपहर शव को कंधा दिया गया तो उसे देखकर और सुनकर भी लोग आश्चर्य में रह गए।
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नानू उर्फ नन्नू पुत्र दलपत जाटव लिसाड़ी गेट के रशीदनगर में करीब 45 साल से मोहम्मद अलीजान के परिवार में रहते थे। करीब 45 साल पहले नानू की मुलाकात प्रॉपर्टी डीलर अलीजान और उनके परिवार के लोगों से हुई थी। शुरूआत में नानू अलीजान के घर जाकर उनके कामकाज में हाथ भी बंटाते। इसके बाद अलीजान और परिवार के लोगों के मन में विश्वास बढ़ता गया। नानू ने कभी न तो अपने परिवार के पास जाने की बात कही, न ही कभी यह समझा कि वह मुस्लिम परिवार में रह रहे हैं।

दो साल पहले नानू को गले का कैंसर हो गया था। लेकिन अलीजान और उनके परिजनों ने इलाज को कभी बोझ नहीं समझा। पहले मेडिकल कॉलेज और निजी अस्पताल में इलाज कराया। दिल्ली में भी इलाज कराने ले गए। कुछ दिनों पहले हालत बिगड़ने पर डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिये। रशीदनगर में अलीजान के घर में ही परिवार के लोग नानू की देखरेख करने लगे। सोमवार देर रात नानू की बीमारी के चलते मौत हो गई।
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मौत का पता चलने पर मंगलवार को शास्त्रीनगर एल ब्लॉक से उनके भाई और परिवार के लोग भी रशीदनगर पहुंच गये। जिसके बाद हिंदू रीति-रिवाज से अलीजान के परिवार और आसपास के लोगों ने अर्थी बनवाकर तैयार की। उसके बाद शव कुछ दूरी तक कंधे पर ले गये। बाद में गाड़ी से सूरजकुंड ले जाया गया। सूरजकुंड पर दोनों समुदाय के लोग दाह संस्कार के समय साथ रहे।

हमें तो गोद में खिलाया है...
अलीजान के 25 वर्षीय बेटे जान आलम ने बताया कि मैं और परिवार के लोग उन्हें नानू चाचा कहकर बुलाते थे। मुझे तो अन्य बच्चों के साथ उन्होंने गोद में खिलाया है। वह परिवार के व्यक्ति की तरह मिलकर रहते थे। उनका उपचार कराने से भी पीछे नहीं हटे। रिश्तेदार और आसपास के लोग भी उनसे मिलकर अपनों की तरह बात करते थे। उनकी मौत से परिवार को बहुत सदमा लगा है। सूरजकुंड पर अंतिम संस्कार के समय शान मोहम्मद, शेरूदीन, इश्तिकार, जाहिद, लुकमान, अमजद, अलीजान आदि मौजूद रहे।

शास्त्रीनगर में रहते हैं परिजन
जान आलम ने बताया कि नानू के भाई और अन्य परिवार के लोग शास्त्रीनगर में रहते हैं। वह बीच में मिलने को आते-जाते थे। लेकिन नानू कभी भी हमारे यहां से जाने को नहीं कहते थे। रिश्तेदारियों में भी वह आते-जाते थे। हमने अंतिम संस्कार के लिए भी उनके परिवार के लोगों से कुछ नहीं मांगा।
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