वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे की नींव कवाल कांड ने देश में राजनीति की दशा और दिशा को बदलकर रख दिया था। न केवल पश्चिमी यूपी, बल्कि देश की सियासत पर दंगे का व्यापक असर दिखा था। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में एकतरफा जीत हासिल की थी, तो सपा को हाशिए पर ला दिया था। बसपा और रालोद एक एक सीट के लिए तरस गए। दंगे का असर 2017 के विधानसभा चुनाव में भी दिखा और इनमें भी भाजपा का ग्राफ हाई रहा।
27 अगस्त 2013 को जानसठ कोतवाली के गांव कवाल में साइकिल और बाइक टकराने को लेकर झगड़ा हुआ था। शाहनवाज की मौत के बाद ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड को सांप्रदायिक रूप दिया गया और पंचायतों का दौर शुरू हो गया। कई दिनों तक ज्ञापन और पंचायतों के बाद सात सितंबर को नंगला मंदौड़ की महापंचायत के बाद जिले में दंगा भड़क उठा था। दंगे को लेकर तत्कालीन सपा सरकार और भाजपा के बीच खींचतान मची थी। सरकार और उसके मंत्रियों पर एक पक्ष का तुष्टिकरण और हत्याकांड के आरोपियों को छुड़ाने के आरोप लगे। राजनैतिक दलों ने एक-दूसरे को हिंसा का जिम्मेदार ठहराया। हिंदुत्व का झंडा उठाए भाजपा के पक्ष में पूरा हिंदू समाज एकजुट हो गया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका लाभ मिला।