पुलिस ने कवाल गांव को घेरकर आरोपियों के घरों में छापामारी और धरपकड़ शुरू कर दी थी। सत्ता में हस्तक्षेप रखने वाले जिले के कुछ सपा नेताओं ने लखनऊ में माहौल बनाया कि दोनों अधिकारी एक वर्ग विशेष का उत्पीड़न कर रहे हैं। शासन ने भी अदूरदर्शिता का परिचय देते हुए दोनों अफसरों का उसी दिन तबादला कर दिया। इसका पूरे जिले में इतना रिएक्शन हुआ कि एक वर्ग में आक्रोश पनप गया, उसका पुलिस और सरकार दोनों से विश्वास उठ गया।
यह अफवाह फैल गई कि सत्ताधारी नेताओं ने थाने में पहुंचकर सभी आरोपियों को छुड़ा दिया। यह आक्रोश पंचायत के रूप में फूटा और हालात इतने खराब हुए कि सरकार और प्रशासन सब फेल हो गए। जिले में दंगे में 65 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यदि डीएम और एसएसपी का तबादला न होता तो हो सकता था जिले में दंगा न होता।
दोनों अफसरों ने जीता था जनता का विश्वास
कवाल कांड से कुछ दिन पहले ही ईद के दिन तावली गांव में एक व्यक्ति की मस्जिद के गेट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के दस मिनट के अंदर ही मौके पर पहुंचकर डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने स्थिति को कंट्रोल किया। आरोपी को गिरफ्तार किया और लोगों को शांत किया।
आक्रोशित जनता को शांत करने में कई मुस्लिम नेताओं का भी सहयोग लिया। एक मायने में यह घटना कवाल की घटना से भी बड़ी थी, लेकिन अफसरों की सूझबूझ से काबू पा लिया गया। इन दोनो अफसरों ने अपने कार्यकाल में हालात को कभी भी बेकाबू नहीं होने दिया। इनके तबादले के बाद आए अफसर स्थिति को भांप ही नहीं सका।
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