इतिहास में 25 जून 1975 का दिन लोकतंत्र सेनानियों के नाम है, जिन्होंने देश में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए आपातकाल में यातनाएं झेलीं। पुलिस ने मेरठ के 147 लोगों को जेल भेजा था। इमरजेंसी के दौरान पुलिस ने थाने के बाद जेल में भी यातनाएं दी थीं।
घर की हो गई थी कुर्की : अरुण वशिष्ठ
मीसा बंदी अरुण वशिष्ठ ने बताया कि वह इमरजेंसी के दौरान मेरठ कॉलेज छात्र संघ में महामंत्री थे। उन पर सिविल लाइंस, लालकुर्ती सहित तीन थानों में मुकदमे दर्ज किए गए। इसके बाद भी वह सक्रिय रहे, लेकिन बाद में उन्होंने सरेंडर कर दिया। इस बीच उनके घर की कुर्की तक हो गई थी। अरुण वशिष्ठ पांच माह जेल में रहे। इसके बाद रिहा हो गए।
आरएसएस के आह्वान पर अरुण वशिष्ठ सत्याग्रह में शामिल हुए और उन पर मीसा लगाई गई। 27 जनवरी 1976 से 8 मार्च 1977 तक फिर जेल में बंद रहे। रिहाई के बाद हजारों छात्र मेरठ कॉलेज पहुंचे और शहर में जुलूस निकाला गया। अरुण वशिष्ठ ने बताया कि चुनाव की घोषणा पहले हुई और इमरजेंसी बाद में हटाई गई।
प्रदीप कंसल को तब लोग कहते थे भगत सिंह
इमरजेंसी के दौरान 21 वर्ष के रहे शास्त्रीनगर निवासी प्रदीप कंसल को तब भगत सिंह कहा जाता था। वह एबीवीपी से जुड़े थे। मेरठ कॉलेज के इस छात्र नेता ने कपड़ों में छिपाकर रखे पटाखे फोड़कर लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया था।
जब इमरजेंसी खत्म होने के बाद जेल से आए थे बाहर... अरुण वशिष्ठ, प्रदीप कंसल, रविंद्र नादर। (दाएं से), तीनों के गले में माला।
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इमरजेंसी के करीब छह माह बाद गिरफ्तार हुए प्रदीप ने बताया कि जो यातनाएं उन्हें जेल में मिलीं, वे आज तक नहीं भूल पाए हैं। पुलिस ने जब प्रदीप कंसल को गिरफ्तार किया, तब सैकड़ों छात्र एकत्रित हो गए। छात्रों ने प्रदीप को छुड़ाते हुए अहिंसात्मक नारे लगाए। हालांकि भारी पुलिस की मौजूदगी में प्रदीप को गिरफ्तार कर लिया गया।
पैरों के नाखून तक उखाड़ दिए
प्रदीप कंसल के पैरों के नाखून तक प्लास से उखाड़ दिए थे। जेल की खाली बैरक में उन्हें डाल दिया गया। 15-20 दिन तक किसी से नहीं मिलने दिया। प्रदीप ने बताया कि उस समय जेल में बंद ठाकुर नरेंद्र सिंह ने अन्य बंदियों के साथ मिलकर उन्हें बाकी बंदियों के पास पहुंचाया। इस बीच जेल तोड़ने की भी बात हुई। हालांकि बाद में प्रदीप को मीसा बंदियों के साथ ही रखा गया। इसके अलावा रविंद्र नादर भी इमरजेंसी के दौरान जेल में रहे थे।