गांव गड़ीना में मजलिस का आयोजन किया गया। क्षेत्र के सैकड़ों लोग इसमें पहुंचे एवं नबी को उनके नवासे का पुरसा दिया। सोगवार मजलिस में वाक्या-ए-करबला सुनकर फूट-फूटकर रोने लगे।
ग्राम गड़ीना में चार मोहर्रम को हर वर्ष की भांति मजलिस आयोजित की गई। मजलिस को मौलाना अम्मार हैदर रिजवी ने खिताब फरमाया। मौलाना ने मजलिस में पढ़ा कि लोग पूछते हैं कि शिया ये मोहर्रम क्यों मनाते हैं।
उन्होंने बताया कि करबला के मैदान में एक तरफ लाखों की फौज थी तथा दूसरी ओर इमाम हुसैन की फौज में सिर्फ 72 लोग थे। यजीद लाखों के लश्कर का मालिक था। यजीद चाहता था कि दुनिया में शराब पीना, जुआ, सट्टा आम हो जाए, जिनाखोरी हो। मां एवं बहनों के साथ बेटे तथा भाई शादी करें। जिसका इमाम हुसैन ने विरोध किया।
यजीद कहता रहा कि हुसैन मेरी बैयत कर लो। लेकिन हुसैन ने बैयत नहीं की। लाखों एवं 72 के बीच जंग शुरू हुई। जिसमें इमाम हुसैन ने शहीद होकर भी इस्लाम बचा लिया और यजीद को भी दस्ते जहान्नम पहुंचा दिया। इसीलिए आतंकवाद के खिलाफ जंग का नाम मोहर्रम है।
मजलिस में मर्सियाख्वानी ओन मोहम्मद व गुड्डू महलकवी ने की। नोहेख्वानी शहजान रिजवी व जफर अब्बास ने की। अंजुमने पर्चम ए गाजी फलावदा ने मातमपुर्सी की। इस दौरान शाही अब्बास, शहंशाह जफर, डॉ. अली अब्बास, जरी अब्बास, शमीम हसन, बाबू रिजवी, बाबर रिजवी, मंजर रिजवी, शमीम रिजवी, सरदार रिजवी आदि मौजूद रहे।