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43 फीसदी मिलावट जनता की सेहत पर भारी  

Tue, 18 Oct 2016 01:52 AM IST
अरुण चट्ठा/मेरठ
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स्वीट शॉप रखीं मिठाइयां। - फोटो : अमर उजाला
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करीब 43 प्रतिशत खाद्य पदार्थों में मिलावट जनता की सेहत पर भारी पड़ रही है। जो कई गंभीर बीमारियों को जन्म दे रही है। खाद्य एवं औषधि सुरक्षा विभाग (एफडीए) ने चालू वित्त वर्ष में आईं सैंपल रिपोर्ट के हवाले से साफ कर दिया है कि हर दूसरे खाद्य पदार्थ में मिलावट का खेल चल रहा है। एफडीए अंदेशा जता रहा है कि  त्योहारी सीजन में मिलावट का स्तर डिमांड बढ़ने के साथ ही दो से चार गुना तक बढ़ जाता है। ऐसे में व्यापारी सैंपलिंग का विरोध कर रहे हैं जबकि शासन और जिला प्रशासन ने सैंपलिंग अभियान से किसी तरह का समझौता न करने के निर्देश दिए हैं। क्योंकि मामला सीधे लोगों की सेहत से जुड़ा है और आंकड़े बता रहे हैं कि व्यापक स्तर पर मिलावट हो रही है।
आंकड़े चौंकाने वाले 
एफडीए ने चालू वित्तीय वर्ष में बीते अप्रैल माह से सितंबर माह के बीच अभियान चलाते हुए जिले में विभिन्न स्थानों से 276 सैंपल भरे थे। जिनमें से 209 सैंपलों की जांच रिपोर्ट मिल चुकी है। इनमें से 87 सैंपल कसौटी पर खरे नहीं उतरे। यानी जांच में फेल साबित हुए हैं। जो कुल सैंपलिंग का करीब 43 फीसदी बैठता है। एफडीए के अनुसार इनमें सात सैंपलों में केमिकल पाया गया है जो सीधे तौर पर सेहत को नुकसान पहुंचाता है। 
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सैंपल रिपोर्ट का सच
एफडीए के अनुसार जिन खाद्य पदार्थों के सैंपल भरे गए, उनमें अधिकांश रूटीन में प्रयोग होने वाले हैं। जैसे दूध, पनीर, मसाले, सॉस, चटनी, नूडल्स, सरसों का तेल, रिफाइंड, नमक, बेसन, नमकीन, बेकरी बिस्किट, वनस्पति घी आदि। मिठाई के तीन सैंपलों में सिंथेटिक कलर मिला। सॉस के दो सैंपलों में हानिकारक कलर पाया गया। खतरनाक श्रेणी में एक सैंपल मसाले का रहा। इन आंकड़ों में एनर्जी ड्रिंक रेडबुल को भी रखा गया, जिसका भी सैंपल फेल पाया गया। 
डिमांड के साथ बढ़ती मिलावट 
शासन और एफडीए मानता है कि त्योहारी सीजन में डिमांड बढ़कर दो से चार गुना तक हो जाती है। जबकि दूध का उत्पादन आम दिनों की तरह ही होता है। ऐसे में बढ़ी हुई डिमांड को पूरा करने के लिए इसमें मिलावट का सहारा लिया जाता है। इसके साथ ही दूध से बने हुए प्रोडक्ट हैं। इसलिए सामान्य तौर पर मिलावट की संभावना बढ़ जाती है। इसके पीछे इस सीजन में मोटी कमाई का भी बड़ा फैक्टर रहता है। 
कलर वाली मिठाई से बचें
एफडीए की सैंपलिंग में 98 फीसदी तक  कलर वाली मिठाईयां फेल हुई है। जितनी भी मिठाईयां कलर लगाकर बनाई जाती है वो स्वास्थ्य के लिए घातक है। क्योंकि इनमें अधिकांश में सिंथेटिक कलर प्रयोग होता है। एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) ने भी सिंथेटिक कलर को प्रतिबंधित कर रखा है।  
मावे की मिठाई भी खतरनाक
त्योहारी सीजन में मावे की मिठाईयों के सैंपलों में करीब 60 से 80 फीसदी तक में मिलावट बीते साल भी पाई गई थी। इनमें खासकर मैदा, मिल्क पाउडर व अन्य उत्पादों को मिलाया जाता है। त्योहार पर खासकर देहात क्षेत्रों में एक सप्ताह पहले से मिठाईयां बननी शुरू हो जाती हैं। जिस कारण से उनकी क्वालिटी ग्राहक तक पहुंचने तक काफी हद तक खराब हो चुकी होती है। 
सैंपल रिपोर्ट का सार (जांच में फेल)
दूध - 16
पनीर -8
खोया मिठाई -7
साफ्ट ड्रिंक - 7
सॉस व चटनी - 6
खोया - 5
नूडल्स - 5
नमकीन - 5
अन्य तरह की मिठाई - 4
सरसों का तेल - 3
रिफाइंड - 2
मसाले - 2
बिना खोया की मिठाई - 2
नमक - 2
वनस्पति - 1
बेसन - 1
बेकरी बिस्किट - 1
कंफेक्शनरी प्रोडक्ट - 1
अन्य उत्पाद - 9

शासन के सख्त आदेशों के क्रम में सैंपलिंग अभियान चलाया जा रहा है। अभी तक जो सैंपल रिपोर्ट आई हैं, उनमें 43 फीसदी खाद्य पदार्थों में मिलावट पाई गई है। इनमें कई में मिलावट तो खतरनाक स्तर की है। त्योहार पर मिलावट बढ़ने का ज्यादा अंदेशा रहता है। इसलिए सैंपलिंग अभियान जारी रहेगा।
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- जेपी सिंह, मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी एफडीए

मेरे कार्यकाल में मेरठ में अभियान चलाकर सैंपल भरे गए थे। जिसमें से 43 से अधिक सैंपल जांच को भेजे गए। इनमें से 98 फीसदी फेल हो गए थे। जनता को खाद्य पदार्थों में जो धीमा जहर खिलाया जा रहा है, वह न केवल कई बीमारियों को जन्म देता है, बल्कि मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कम कर देता है। कुछ को लीवर व किडनी फेल होने की समस्या हो रही है। एफडीए को चाहिए कि वह व्यापक स्तर पर अभियान चलाकर मिलावट रोके।
- बादल चटर्जी पूर्व कमिश्नर एफडीए
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