2017 में भाजपा यूपी की जनता के दिलों पर ऐसी छायी कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा, सपा समेत कई दलों का गठबंधन नहीं टिक पाया। इसके अलावा भाजपा को सबसे अधिक सांसद उत्तर प्रदेश से ही मिले।
अगर 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो बसपा ने सपा के गठबंधन में शामिल होकर चुनाव लड़ा था। इसके बावजूद बसपा को उप्र के सहारनपुर, बिजनौर, नगीना, आंबेडकर नगर, श्रावस्ती , लालगंज, घोस और गाजीपुर समेत दस सीटें ही मिली पायी थीं। सपा केवल पांच सीटों पर ही सिमट कर रह गई थी। कांग्रेस को तो केवल रायबरेली की एक लोकसभा सीट पर ही संतोष करना पड़ा। कांग्रेस से आगे तो अपना दल एस भी दो सीट पाकर आगे निकल गया था।
2022 के उप्र विधान में बसपा अकेले चुनाव लड़कर उप्र की केवल एक सीट बलिया की रसड़ा विधान को ही 6585 मतों से जीत पायी थी। निकाय चुनाव 2023 में भी बसपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। अब लोकसभा चुनाव 2024 का बिगुल बज चुका है। ऐसे में समाज के लोग बसपा को लेकर अलग- अलग मत पेश कर रहे हैं।
दलित चिंतक प्रो. सतीश कुमार मानते हैं कि दलितों को सत्ता परिवर्तन का हथियार बनकर रहने की बजाय, सत्ता में साझेदारी के लिए कदम उठाना चाहिए। गठबंधन से बसपा को कभी लाभ नहीं मिला। दलितों के लिए भाजपा और कांग्रेस कभी ठीक नहीं रही। दोनों के करनी और कथनी में अंतर है। दलितों को अपना मुस्तकबिल खुद ही तय करना होगा।
दलित चिंतक रामकुमार असनावड़े कहते हैं हम अध्यात्म पर काम कर रहे हैं, लेकिन जिस समाज में पैदा हुए हैं उसका चिंतन भी जरूरी है। इस समय समाज स्वयं को ठगा महसूस कर रहा है। बसपा अपने मिशन से भटक चुकी है। जिसका परिणाम 2019 के लोकसभा और 2022 के विधान सभा चुनाव के नतीजे हैं।
मुरारीलाल कैन का कहना है कि गठबंधन में चुनाव लड़कर पार्टी का वोट दूसरे दलों के प्रत्याशी को ट्रांसफर हो जाता है। इसलिए बहनजी ने लोकसभा चुनाव अकेले ही लड़ने का निर्णय लिया है वह सोच समझकर ही लिया होगा।
विधान सभा और लोकसभा में बसपा का वोट प्रतिशत
वर्ष चुनाव मिली सीट वोट प्रतिशत
2007 विधानसभा 206 51.12
2012 विधान सभा 80 19.85
2022 विधान सभा 01 12.88
2014 लोकसभा 00 19.06
2019 लोकसभा 10 6.28