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ईरान-अमेरिका तनाव का असर: सऊदी, ईरान और इराक को बासमती चावल की आपूर्ति प्रभावित, बंदरगाहों पर अटका माल

Wed, 27 May 2026 01:03 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

ईरान-अमेरिका तनाव का असर भारतीय बासमती चावल कारोबार पर दिखने लगा है। सऊदी अरब, ईरान और इराक समेत खाड़ी देशों को आपूर्ति प्रभावित हुई है। बंदरगाहों पर माल फंसा है और कंटेनर संकट से निर्यातकों की चिंता बढ़ गई है।

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बासमती चावल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पश्चिम एशिया में बढ़ते ईरान-अमेरिका तनाव का असर अब भारतीय बासमती चावल कारोबार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। खाड़ी देशों को भेजे जाने वाले बासमती चावल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। बंदरगाहों पर बड़ी मात्रा में माल फंसा हुआ है, जबकि कंटेनरों की कमी और जहाजों की सीमित उपलब्धता ने निर्यातकों की परेशानी बढ़ा दी है। कारोबारियों का कहना है कि हालात लंबे समय तक बने रहे तो पश्चिम उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।

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खाड़ी देशों में भारतीय बासमती की भारी मांग
भारत का सबसे बड़ा बासमती बाजार सऊदी अरब माना जाता है। इसके अलावा ईरान, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और यमन जैसे देशों में भी भारतीय बासमती की भारी मांग रहती है। इन देशों में भारतीय बासमती से बनने वाली बिरयानी और अन्य व्यंजन बेहद लोकप्रिय हैं। कुल बासमती निर्यात का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों में जाता है। अकेले ईरान ही 15 से 20 प्रतिशत तक बासमती चावल खरीदता रहा है।

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बंदरगाहों पर अटका लाखों टन माल
निर्यातकों के अनुसार करीब दो लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों और परिवहन मार्गों में फंसा हुआ है। कंटेनर समय पर नहीं मिल पा रहे हैं और जहाजों की आवाजाही भी प्रभावित हुई है। इससे माल ढुलाई की लागत में भारी बढ़ोतरी हो गई है। जो कंटेनर भाड़ा पहले 1200 से 1800 डॉलर तक था, वह अब बढ़कर 2500 से 3500 डॉलर तक पहुंच गया है। बढ़ती लागत का सीधा असर निर्यात कारोबार पर पड़ रहा है।

पश्चिम उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर असर
मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर और आसपास के जिलों में बड़ी संख्या में बासमती प्रसंस्करण इकाइयां और चावल मिलें संचालित हैं। इनका बड़ा कारोबार खाड़ी देशों पर निर्भर करता है। निर्यात प्रभावित होने से उत्पादन और व्यापार दोनों प्रभावित हो रहे हैं। कारोबारियों का कहना है कि यदि तनाव और बढ़ा तो निर्यात आदेश रद्द होने और कारोबार ठप पड़ने जैसी स्थिति भी बन सकती है।

तीन माह बाद बढ़ सकती है मांग
बासमती निर्यात से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय धान की बुवाई का मौसम चल रहा है और नई फसल आने में दो से तीन माह का समय लगेगा। इस दौरान विदेशों में चावल का भंडार कम हो सकता है। ऐसे में भविष्य में अचानक मांग बढ़ने की संभावना है, जिससे किसानों और कारोबारियों को राहत मिल सकती है।
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