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अमर उजाला की खास रिपोर्ट: वेस्ट यूपी में बेजुबां गायों की दुर्दशा, लाचार किसानों को भारी नुकसान

Sat, 12 Jan 2019 07:08 PM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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बुढ़ेडा गांव में गोवंश पकड़ते युवक - फोटो : अमर उजाला
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सियासत के दो पाटों के बीच गोमाता पिस रही है। गोरक्षा, गोकशी और भीड़ हिंसा के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में तलवारें खिंची रहीं। मुख्यमंत्री के सख्त तेवर देख सरकारी अमला गोवंशीय पशुओं के पीछे दौड़ रहा है। फसलों को नुकसान पहुंचाने से आहत ग्रामीणों के आवारा पशुओं को पकड़कर सरकारी भवनों में बंद करने की एक नई मुहिम शुरू हो गई। सियासी नफा नुकसान का गणित भांपने में माहिर राजनीतिक दल भी इस मुहिम को हवा दे रहे हैं। तेज होती सियासत के बीच गाय की दुर्दशा हो रही है। गाय की कीमतों में भारी गिरावट आई है। गोवंशीय पशुओं को पकड़ा तो जा रहा हैं, लेकिन आखिर इन्हें लेकर कहां जाएं, चारागाह भी नहीं बचे हैं। चंदे से चल रही गोशालाओं के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह इन्हें चारा खिला सकें। कांजी हाउस पहले ही बंद हो गए, प्रदेश सरकार की गोशालाओं के निर्माण की योजना परवान नहीं चढ़ पाई। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि कहां जाए बेचारी गाय...

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समय ने ऐसी करवट बदली कि गाय और गोवंश प्रदेश की सियासत के केंद्र में आकर खड़ा हो गया है। बंजर भूमि खेतों में बदल चुकी है। चारागाह नजर नहीं आते। आंखों के सामने ही फसलों को लुटता देख किसान लाचार हो गए हैं। पहले खेतों पर सिर्फ बाड़ लगाई जाती थी, गोवंश बढ़े तो कंटीले और ब्लेड वाले तारों की संख्या बढ़ गई। इनमें फंसकर गोवंशीय पशु जख्मी हो रहा है। लेकिन अब स्थिति जैसे किसानों के हाथ से भी निकल चुकी है। वजह है गेहूं की फसल। गोवंश अगर फसलों को यूं ही चट करते रहे तो गेहूं का उत्पादन घटेगा और किसानों के सामने मुश्किलें खड़ी हो जाएगी। आंकड़े बताते हैं कि बागपत में आवारा गोवंश की संख्या साढे़ छह हजार के पार पहुंच चुकी है। यमुना, हिंडन और कृष्णा नदी के खादर के अलावा हर गांव में अब गोवंश लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती के बाद आश्रय स्थल की तलाश तेज हो गई हैं। जहां गोशालाएं चल रही हैं, वहां पर अब व्यवस्थाओं में सुधार कराया जा रहा है। 

डीएम ऋषिरेंद्र कुमार कहते हैं कि वर्तमान में संचालित गोशालाओं के अलावा आश्रय स्थलों का निर्माण होगा, जिनमें गोवंश को रखा जाएगा। किसानों को भी इससे बड़ी राहत मिलेगी।

बेकीमत हो गई कान्हा की गाय
बदलते दौर में गायों की कीमत धड़ाम हो गई है। किसानों के घर का अटूट हिस्सा माने जाने वाले बछड़ों को कोई खरीदने के लिए तैयार नहीं है। पिछले डेढ़ साल में गायों की कीमत भी गिरी है। पहले दुधारू गाय की कीमत 25 से 35 हजार रुपये थी, लेकिन अब सिर्फ 10 हजार कीमत रह गई है। यही नहीं खरीदार मिलना भी आसान नहीं है। वजह है कि पशु व्यापारियों से दुधारू गाय के बदले बछड़े या दूध देना बंद कर चुकी गाय भी पशुपालक दे देते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। खरीदार नहीं तो गोवंशीय पशु खुले में छोड़ दिए जा रहे हैं। यह खेतों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

जानलेवा साबित होने लगे हैं गोवंशीय पशु
आवारा घूम रहे गोवंशीय पशु खासकर सांड़ अब जान के लिए भी खतरा बन गए हैं। किसानों पर कई बार हमला कर चुके हैं।  किसान  इन्हें भगाने के लिए लाठी मारते हैं, लेकिन पशु हमला कर रहे हैं। जिले में एक किसान को सांड ने टक्कर मारकर जान ले ली थी। युवा किसान क्लब के अध्यक्ष  सुभाष नैन कहते हैं कि आए दिन गोवंशीय पशु किसानों को घायल कर  रहे हैं। प्रशासन को स्थायी इंतजाम करने चाहिए। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. राजपाल सिंह का कहना है कि पशु चारे की तलाश में जंगल की तरफ जाते हैं। उन्हें बार-बार खदेड़ा जा रहा है, यही वजह है कि भूख और प्यास ने उन्हें चिड़चिड़ा बना दिया है।

गोशालाओं में भी दुर्गति
बड़ौत में आचार्य विद्या सागर पशु संरक्षण केंद्र के लिए जमीन कम है, जबकि यहां पर 300 से ज्यादा गाय हैं। कमेटी अध्यक्ष धनपाल कहते हैं कि जगह का अभाव है। अधिकतर गाय बूढ़ी या बीमार हैं। गोसेवा संदन के संचालक नवीन अग्रवाल बताते हैं कि 240 गाय हैं। जगह का अभाव है। करीब 20 गाय दुधारू हैं, इनके दूध और समाज के सहयोग से गायों के चारे की व्यवस्था करते हैं। इसके अलावा जिले में 17 जगह ग्राम पंचायत अपने स्तर से गोशाला संचालित कर रही हैं। डूंडाहेड़ा आश्रम में भी गोशाला हैं। यहां भी जगह का अभाव बताया गया।

विदेशी नस्ल का गोवंश बना किसानों के लिए मुसीबत
किसानों के लिए देशी नहीं बल्कि विदेशी प्रजाति का गोवंश मुसीबत बना है। विदेशी नस्ल की एचएफ और जर्सी गायें  बांझपन की शिकार हो रही है। इनके बछड़े खेती के प्रयोग में भी नहीं आते हैं। ऐसे में किसान गोवंशीय पशुओं को खुला छोड़ देते हैं।
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चारागाह की जमीन खाली कराई 
मुजफ्फरनगर के गांवों में खेतों को उजाड़ रहे और शहरों में गंदा कूड़ा खाने को मजबूर गोवंश के लिए सुरक्षित स्थान ढूंढने के लिए प्रशासन ने काम शुरू कर दिया है। निकायों में कान्हा पशु योजना पर कार्य शुरू कर दिया गया है जबकि ग्रामीण क्षेत्र में गोसंरक्षण केंद्र बनाने के लिए चारागाह की जमीनों को खाली कराया जा रहा है। बुढ़ाना के गांव कुरथल में दस हेक्टेयर जमीन खाली कराई गई है। फिलहाल आठ गांवों को चिह्नित किया गया है। शिकारपुर, नगवा, जड़ौदा, फलौदा में भी चारागाह की जमीन खाली कराने का कार्य चल रहा है।     

सड़कों पर घूम रहे गोवंश, अफसर अनजान 
सड़कों पर गोवंश घूमने से रोकने संबंधी आदेश के बावजूद प्रभावी रूप से अंकुश नहीं लग पा रहा है। अभी भी शहर में काफी स्थानों पर गोवंश खुले ही सड़कों पर घूमते नजर आ रहे हैं, जबकि नगर निगम दावा करता है कि गोवंश को पकड़ने का अभियान चल रहा है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डाक्टर वाईपी सिंह का कहना है कि जिले में पंजीकृत चार गोशाला हैं, जबकि कुछ अपंजीकृत गोशाला भी हैं।

आवारा गोवंश को मिली नई पहचान
शहर-गांव की सड़कों पर आवारा घूमने वाले गोवंश को नई पहचान दी गई है। गोशाला में पहुंचते ही आसरा मिला और पशुपालन विभाग की टैगिंग की जा रही है। टैगिंग नंबर से ही उनकी ताउम्र पहचान बन जाता है। पशुपालन विभाग के प्रशिक्षित कर्मचारी गोवंश के कानों में एक पीले रंग का प्लास्टिक का बिल्ला लगाते हैं। इन बिल्लों पर एक नंबर लिखा होता है। इसे गोशाला और पशुपालन विभाग के रिकार्ड में दर्ज कर लिया जाता है। यही नंबर उसका नाम बन जाता है।

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