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Meerut: देवोत्थान एकादशी पर योग निद्रा से जागेंगे श्री हरि, शहर के अधिकांश मंडप बुक, बजेंगी 450 शहनाई

Wed, 02 Nov 2022 12:54 PM IST
Dimple Sirohi अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ

सार

मेरठ में देवोत्थान पर चार नवंबर को तुलसी-शालीग्राम विवाह के साथ ही शहर में 450 शादी समारोह आयोजित होंगे। अधिकांश मंडप बुक हो गए हैं। बाजारों में भी शादी की जमकर खरीदारी की जा रही है। 
 
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शादी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु का शयन काल समाप्त होता है। ऐसे में दिवाली के बाद आने वाली इस एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी और देव उठनी एकादशी या देवोत्थानी एकादशी कहते हैं।
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आचार्य विनोद त्यागी ने बताया कि इस दिन वैष्णव ही नहीं स्मार्त श्रद्धालु भी बड़ी आस्था के साथ व्रत करते हैं। भगवान के जगने से सृष्टि में तमाम सकारात्मक शक्तियों का संचार होने लगता है। इस दिन भगवान के जगने का उत्सव देवतागण भी व्रत पूजन द्वारा मनाते हैं। 

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कार्तिक मास में इस तिथि को शालिग्राम और तुलसी माता का विवाह संपन्न करवाया जाता है। इस दिन तुलसी पूजा का अधिक महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन इनकी पूजा से व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता, साथ ही साथ पितृ दोष से भी राहत मिलती है। इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु व अपने अपने इष्ट देव की उपासना करने का महत्व है। ऐसा करने से व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
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आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि शास्त्र बताते हैं इस दिन जितना हो सके व्यक्ति को मंत्र का जाप करना चाहिए। श्री विष्णु भक्त और वैष्णव संप्रदाय की मान्यता वाले लोग एकादशी तिथि के दिन यानी चंद्र पखवाड़े के ग्यारहवें दिन एक दिन का उपवास रखते हैं। 

देवता भी करते हैं व्रत
देवोत्थान एकादशी पर मनुष्य ही नहीं, बल्कि देवी-देवता भी व्रत करते हैं। पद्मपुराण में कहा गया है कि इस दिन व्रत करने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन से सभी शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं। इस दिन की स्वामिनी विष्णु प्रिया देवी लक्ष्मी हैं।

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व्रत करने से एक साथ लक्ष्मी और नारायण के व्रत का फल व्रतियों को प्राप्त होगा। चातुर्मास की अवधि को विवाह, मुंडन, या गृहिणी समारोह जैसे आयोजनों के लिए अनुपयुक्त माना जाता है। इसलिए, लोग शुभ समारोहों की योजना बनाने आयोजन करने के लिए चातुर्मास की अवधि समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हैं।
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