मेरठी कारीगरों के हाथों के हुनर से ही शहर के खेल उद्योग की सांसें जिंदा हैं। दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां तकनीक से जुड़कर मशीन से बल्ले की छिलाई, गेंद की सिलाई, पीस की कटाई पर आ गईं। लेकिन शहर में आज भी मशीन के बजाय अंगुलियों की कारीगरी को तवज्जो दी जाती है। पूंजी अभाव कहें या उद्यमियों के उसूल मेरठ के खेल उद्यमी आज भी हाथों से लकड़ी की छिलाई, कटाई, रंगाई और फिनिशिंग में यकीन रखते हैं। पुराने कारीगरों ने अपने हुनर से नई पीढ़ी को सींचा। युवा कारीगरों ने भी पूर्वजों की सीख अपनाकर खुद को पुराने गुणों में ढाल लिया।
पहले 700- 800 ग्राम का बल्ला बनता था। आज 1200 ग्रा. का बल्ला बनता है। इंग्लिश विलो से ज्यादा कश्मीर विलो का बल्ला बनता था।
- राकेश महाजन, संचालक बीडीएम इंटरनेशनल
क्रिकेट के बल्ले में पांच दशकों में जो बदलाव आया है, वो मेरठ की देन है। विभाजन से पहले सियालकोट, पंजाब का इलाका खेल उद्योग का हब था। लेकिन आज मेरठ बल्ला हब है। क्रिकेट किट में जो भी बदलाव होता है उसका आगाज मेरठ से होता है।
- अनिल सरीन एमडी एसएफ स्पोर्ट्स
क्रिकेट और मेरठ एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। 1947 के बाद खेल उद्योग की जो शुरुआत मेरठ में हुई वो आज पिंक बॉल के सफर को तय कर चुकी हैं। ये सफर इतना आसान नहीं था, इस दौरान कई उतार चढ़ाव कारोबार में आए।
- पारस आनंद, एसजी इंटरनेशनल
नोट- इन खबरों के बारे आपकी क्या राय हैं। हमें फेसबुक पर कमेंट बॉक्स में लिखकर बताएं।
शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें
https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/