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भाजपा में घमासान, धड़ों में बंटती पार्टी

Mon, 11 Jan 2016 01:45 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
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जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव परिणाम के बाद पार्टी दो धड़ों में बंटती नजर आ रही है। पार्टी में जहां एक तरफ घमासान मचा है तो बड़े नेता अपनी जिम्मेदारी लेने के बजाए छोटों पर आरोप लगाते नजर आ रहे हैं। इनमें पार्टी के पुराने कार्यकर्ता और निर्वाचित जिपं सदस्यों को सबसे ज्यादा संदेह के घेरे में लाया जा रहा है। जिससे गुटबाजी और ज्यादा बढ़ती नजर आ रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गृह जनपद में हार से भाजपा को ओर ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है।
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भाजपा पहली बार सक्रिय रुप से जिला पंचायत चुनाव में उतरी थी। उसके नौ सदस्य चुनाव जीतकर आये थे, जबकि बागी होकर जीतकर आए रोहताश गुर्जर को भी पार्टी ने अपने साथ गिनते हुए इनकी संख्या दस पहुंचा दी थी। भाजपा ने कुलविंदर सिंह को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी घोषित किया और चुनाव संचालन की कमान क्षेत्रीय महामंत्री जयकरण गुप्ता, सरधना विधायक ठा. संगीत सोम और दक्षिण विधायक रविंद्र भड़ाना को सौंप दी।

जबकि जिला इकाई भी इनके साथ सक्रिय रही। लेकिन चुनाव संचालन की मुख्य कमान इन्हीं तीनों के बीच रही। चुनाव परिणाम आने के बाद जहां बड़े नेता क्रॉस वोटिंग होना हार का मुख्य कारण बता रहे हैं। वहीं भाजपा के अधिकांश कार्यकर्ताओं के गले यह बात नहीं उतर रही है। इसका कारण भी साफ नजर आ रहा है।
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थीं 16 तो 23 कैसे बताईं
भाजपा का चुनाव संचालक मंडल भले ही क्रॉस वोटिंग का दावा कर रहा हो, लेकिन कई सवाल उनके दावों पर भी उठ रहे हैं। चुनाव संचालक लगातार 23 वोटों का समर्थन होने का दावा करते रहे। लेकिन जिस दिन मतदान हुआ, उस दिन सिर्फ 16 सदस्य ही वोट डालने पहुंचे। इसका गणित भी साफ है। सबसे पहले कुलविंदर सिंह पहुंचे तो उसके बाद डॉ. मीनाक्षी भराला और नितिन खटीक के नेतृत्व में नौ सदस्य वोट डालने पहुंचे।

जबकि सबसे अंत में भाजपा खेमे से छह वोट आईं। ऐसे में कुल 16 वोट भाजपा के खुले तौर पर डलने के लिए आए।  अब सवाल यह उठता है कि जब भाजपा खुले तौर पर 16 ही वोटों को जुटा पायी थी कि वो कौन सी रणनीति और दावा था जिसमें वह 23 वोटों के समर्थन का दावा कर रहे थे।

कौन सी थी वो रणनीति
भाजपा नेताओं के बयानों के बाद अब कार्यकर्ता खुलकर बोलने लगे हैं। उनका कहना है कि चुनाव के लिए 18 सदस्यों का समर्थन जरूरी था, फिर चुनाव संचालक कैसे 16 वोट ही अपने साथ लेकर मतदान करने पहुंचे। इसके बाद भी 23 वोट होने का दावा करते रहे। सवाल है कि आखिर वो कौन सी रणनीति थी कि दूसरे खेमे में मौजूद सात वोटों को नेता अपनी बताते हुए समर्थन का दावा करते रहे। ऐसे सदस्य जो खुलकर सामने भी नहीं आ पाए, वह वोट कैसे करते।
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