कैंट सीट पर बसपा के जाट कार्ड ने भाजपा के लिए टेंशन खड़ी कर दी है। जाट-दलित समीकरण के मद्देनजर इस बार भाजपा के लिए कैंट सीट आसान नहीं होगी। वैसे भी पिछले चार चुनावों से भाजपा का ग्राफ कैंट में लगातार गिरता जा रहा है। ऐसे में इस नए समीकरण से पार पाना भाजपा के लिए चुनौती नजर आ रहा है।
कैंट सीट पर 1989 से अब तक भाजपा का कब्जा भले ही रहा हो, लेकिन उसकी स्थिति यहां हर चुनाव में कमजोर होती गई। वर्ष 2012 का चुनाव तो भाजपा बहुत ही कम अंतर से जीती थी। वहीं, बसपा ने इस सीट पर लगातार दो बार पंजाबी कार्ड खेलते हुए सुनील वाधवा को चुनाव में उतारा। लेकिन वाधवा दलित वोट के साथ पंजाबी वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में नहीं कर पाए, जिस कारण भाजपा को जीत हासिल हुई।
भाजपा ने यहां पर सबसे बड़ी जीत 1996 में हासिल की थी। तब अमित अग्रवाल 42 हजार वोटों से चुनाव जीते थे। इसके बाद वर्तमान विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल को 2002 में चुनाव लड़ाया गया, और उन्होंने करीब 15 हजार वोटों से जीत हासिल की। जबकि वर्ष 2007 में सत्यप्रकाश अग्रवाल करीब 14 हजार तो वर्ष 2012 में उनकी जीत मात्र 3276 वोटों पर सिमटकर रह गई।
भाजपा के लिए खतरे की घंटी
इस बार बसपा ने कैंट सीट पर जाट कार्ड खेला है। नए परिसीमन में कैंट सीट पर जाट वोटों की संख्या बढ़ी है। पल्लवपुरम, गंगानगर, श्रद्धापुरी जैसी बड़ी कॉलोनियाें के साथ ही कई गांव जाट बहुल हैं। करीब साढ़े तीन लाख वोटों वाली इस विधानसभा में 40 हजार जाट और 50 हजार बसपा का दलित वोट बैंक है। यही नहीं, कैंट क्षेत्र में सपा की जीत सुनिश्चित न मानते हुए यहां का मुस्लिम भी बसपा के पक्ष में वोट करता है।
ऐसे में करीब 30 हजार मुस्लिम भी बसपा के माने जाते हैं। जो आंकड़ा कुल वोटों के आधे के आसपास बैठता है। जबकि कैंट में 80 हजार वैश्य, 30 हजार ब्राह्मण और 20 हजार पंजाबी हैं। कांग्रेस इस सीट पर लगातार चुनाव लड़ती रही है। इस बार भी कांग्रेस यहां से पंजाबी या ब्राह्मण को मैदान में उतारकर बसपा नहीं, भाजपा का ही खेल बिगाड़ेगी।
धुरंधर की तलाश
बसपा के इस जातीय समीकरण के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए भाजपा भी किसी धुरंधर को मैदान में उतार सकती है। हालांकि भाजपा में सबसे बड़ी मुश्किल प्रत्याशी तय करना भी होगा। क्योंकि कैंट सीट पर भाजपा में सबसे ज्यादा दावेदार हैं। ऐसे में आपसी गुटबाजी भी चुनाव में भारी पड़ सकती है।