हाल में रिलीज हुई फिल्म एयरलिफ्ट ने कुवैत के उन 30 दिनों की याद ताजा करा दी है। करीब 25 साल पहले के उन डरावने पलों को ‘अमर उजाला’ से साझा कर मेरठ के अरुण वशिष्ठ आज भी सिहर उठते हैं।
इराक ने कच्चे तेल की चोरी का आरोप लगाते हुए कुवैत पर हमला कर दिया था। लाखों भारतीय दो देशों के इस युद्ध में कुवैत में नजरबंद हो गए थे।
कुछ घंटों के अंतराल में कुवैत पर कब्जा हो गया था। कुवैत की उस समय की करीब दस लाख जनसंख्या में आठ लाख तो विदेशी थे। जिनमें करीब दो लाख लोग भारतीय थे। जो इस गंभीर संकट में फंस गए थे।
दो अगस्त 1990 का वो दिन
मोदीनगर में रह रहे मूल रूप से कोटला (मेरठ) निवासी अरुण वशिष्ठ वर्ष 1990 में कुवैत के सहील स्थित मीना अल अहमदी आयल रिफाइनरी में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर तैनात थे। वह बताते हैं कि दो अगस्त 1990 को सद्दाम हुसैन के लड़ाकों ने कुवैत पर हमला बोला था।
उस समय वहां के हिसाब से दोपहर के 2:30 बजे थे। इराक की फौज ने हमले के साथ ही कुवैत की पूरी संचार व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था। टीवी टॉवर, एयरपोर्ट, रनवे सहित पूरी कम्युनिकेशन सिस्टम नष्ट कर दिया गया।
उस समय मैं अपने साथियों के साथ मेस में था। बाहर अचानक विस्फोट की आवाज हुई। चंद घंटों के अंतराल में कुवैत को इराक द्वारा टेकओवर करने की सूचना आग की तरह फैल गयी थी, जिससे हम दहशत में थे।
हफ्तों तक गुजरी सड़कों पर रातें
हमले के बाद सब कुछ अस्त-व्यस्त हाे गया था। लोगों ने हफ्तों तक सड़कों पर रात गुजारीं। खाने तक को मोहताज हो गए। भारतीय विदेश मंत्री और एंबेसी के हस्तक्षेप के बाद चंद लोग ही सुरक्षित बाहर निकाले जा सके।
नजरबंद होकर किया भारतीयों ने काम
सड़कों पर सेना थी और लोग घरों में कैद थे। लेकिन हर तरफ माहौल शांत था। तेल रिफाइनरी में इराक की सेना पहुंच गयी। अरुण वशिष्ठ ने बताया कि उनकी तेल कंपनी अमेरिकन बेस थी। लेकिन उनका चीफ मैनेजर हामिद इराक का था। जिसके चलते कर्मचारियों को कोई समस्या नहीं हुई।
कर्मचारियों को युद्ध के बावजूद काम जारी रखने के आदेश दिए गए। युद्ध के माहौल के बीच भारतीय कर्मचारियों ने नजरबंद होकर रात-दिन काम किया। यूएनओ के हस्तक्षेप के बाद जब तेल न खरीदे जाने की बात फैली तो तब रिफाइनरी को बंद कर दिया गया।
इराक से वाया जॉर्डन पहुंचे भारत
आयल रिफाइनरी में बीस दिन से अधिक समय तक नजरबंद रहने के बाद तेल कंपनी की बस में ही आयल रिफाइनरी में कार्यरत कर्मचारी कंपनी की ही बसों की मदद से इराक पहुंचे। यहां से इन्हें जॉर्डन जाना था। एंबेसी के बाहर सड़कों पर हफ्ते भर तक समय काटा। जैसे-तैसे भोजन की व्यवस्था हो पायी।
हालांकि, इराक के लोगों ने भारतीयों के साथ कोई अभद्रता नहीं की। यहां से भारतीय नागरिक जॉर्डन पहुंचे और एंबेसी की मदद से उन्हें करीब तीस दिन बाद भारत भेजा जा सका।
किशोरों के हाथों में थे हथियार
इराक-कुवैत युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी अरुण वशिष्ठ बताते हैं कि इराक की सेना में ज्यादातर किशोर छात्र थे। जिनके हाथों में हथियार देकर युद्ध के लिए भेज दिया गया था।
स्कूल जाने की उम्र में वह हथियार चला रहे थे। ज्यादातर किशोरों से उनका परिचय उस समय हुआ, जब वह सहील पर कब्जे के दौरान इराकी सेना की बटालियन उनकी मेस में खाना खाने के लिए रुकी थी।