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स्वादिष्ट रुमाली रोटी बहुत ‘गंदी’

Mon, 29 Feb 2016 01:30 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
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होटल, रेस्टोरेंट और ठेले पर मिलने वाली रुमाली रोटी आपको बीमार कर सकती हैं। ये रोटियां बहुत ही गंदी जगह पर बनाई जा रही हैं। निर्माता न तो स्वच्छता का ध्यान रख रहे हैं और न ही रोटी बनाने का कोई मानक है। ये स्थान इतने गंदे हैं पर आप यहां बैठना तक पसंद नहीं करेंगे। रोटी में आटा भी बहुत ही निचले स्तर का लगाया जा रहा है। अगर आप इन रोटियों को लंबे समय तक खाएंगे तो अस्पताल पहुंचाना तय है।
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शहर में लगभग 20-25 रुमाली रोटी के सप्लायर हैं। ये प्रतिदिन 80 से 1 लाख रोटियों की सप्लाई करते हैं। छोटा सप्लायर लगभग 4 हजार रोटी प्रतिदिन सप्लाई कर देते है। छोटे-छोटे बच्चे इन रोटियों को तैयार करते हैं। शहर में वैली बाजार, छतरी वाला पीर, कोटला, लिसाड़ी गेट, घंटाघर, पिलोखड़ी रोड पर रोटियां बनाई जाती हैं।

कारीगर सफाई का ध्यान नहीं रखते हैं। एक रोटी निर्माता अपना खर्चा और मुनाफा जोड़कर लगभग 1 से 1.5 रुपये में रोटी होटल तक पहुंचाता है। एक रोटी पर निर्माता 50 पैसे तक बचा लेता है। 100 रोटियों का पैकेट बनाया जाता है। व्यापारी एक पैकेट से 50 रुपये कमाता है। छोटा व्यापारी एक दिन में दो हजार रुपये तक कमा लेता है।
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छप्पर में लगा तंदूर, मक्खियों का राज
छप्पर में तंदूर लगाए गए हैं। कोटला और वैली बाजार के ढाबों की स्थिति बहुत खराब है। छोटी सी अस्थाई रसोई में 10 से 12 लोग एकसाथ काम करते हैं। कारीगरों के हाथ बहुत गंदे रहते हैं। ये दस्ताने तक नहीं पहनते हैं। रोटियों को निकलकर खुले में ही ठंडा होने के लिए रख दिया जाता है। इस स्थान पर भी मक्खियां भिनकती रहती हैं। कागज में लपेटकर रोटियों की ठेलों की मदद से सप्लाई किया जाता है।

बड़े होटलों में भी होती है सप्लाई
रोटी निर्माता ढाबों के साथ बड़े होटलों में भी सप्लाई करते हैं। बेगमपुल, गढ़ रोड, घंटाघर और दिल्ली रोड सहित शहर के तमाम छोटे-बड़े होटलों में ऑर्डर पर रोटी भेजी जाती हैं। कई स्थानों पर दो बार में सप्लाई दी जाती है। कुछ लोग एक बार 300 रोटी तक खरीदते हैं। चाट के ठेलों पर भी धड़ल्ले से इन रोटियों की सप्लाई होती है।

छोटे बच्चे हैं कारीगर
स्कूल जाने की उम्र में बच्चे रोटियां बना रहे हैं। संचालक पैसे बचाने के चक्कर में बच्चों से काम करवाते हैं। अभिभावक और स्वयं बच्चे भी लालच में यह काम करते हैं। कोटला और वैली बाजार में काम कर रहे बच्चों ने बताया कि तीन साल से लगातार ढाबे पर लगे हैं। सफाई का इनको कोई ज्ञान नहीं है।
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