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न पद, न योग्यता, फिर भी दे दी नौकरी

Wed, 13 Jan 2016 02:32 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
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शहर के प्रमुख स्कूलों में शुमार एसएसडी लालकुर्ती तीन फर्जी नियुक्तियों को लेकर चर्चा में है। ये नियुक्तियां तीन दशक पहले की गईं थीं। आरटीआई (सूचना का अधिकार) में फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ तो हड़कंप मच गया। सचिव माध्यमिक शिक्षा और मुख्यमंत्री तक से मामले की शिकायत की गई है।
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रोहटा रोड स्थित हरवंश विहार निवासी आंचल ने आरटीआई के तहत डीआईओएस से 15 बिंदुओं पर सूचना मांगी थी। उन्होंने संस्कृत की अध्यापिका रेखा शर्मा, सामाजिक विज्ञान के सहायक अध्यापक संजीव कुमार और लिपिक प्रमोद कुमार की नियुक्ति के संबंध में पूरा ब्योरा मांगा था।

डीआईओएस ने प्रधानाचार्य बीपी सिंह को सूचना देने के निर्देश दिए थे। 14 दिसंबर को प्रधानाचार्य ने आंचल को बिंदुवार सूचना उपलब्ध कराई। खुलासा हुआ कि तीनों लोगों की नियुक्ति कई मायने में संदेह के घेेरे में है। उधर, सूचना मिलते ही बागपत रोड स्थित मधुबन कॉलोनी निवासी कुलदीप सिंह ने सचिव माध्यमिक शिक्षा और मुख्यमंत्री से शिकायत कर दी। उन्होंने आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
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बिना योग्यता के बनाया सहायक अध्यापक
विद्यालय के सहायक अध्यापक (हिंदी, संस्कृत) आनंद कृपाल की मृत्यु के बाद 1986 में रेखा शर्मा को नियुक्ति दी गई। सहायक अध्यापक बनने के लिए बीए में हिंदी और संस्कृत होनी चाहिए थी, लेकिन रेखा के पास इनमें से एक भी विषय नहीं था। उन्होंने बीए अंग्रेजी, राजनीतिक विज्ञान और इतिहास से की है।

संस्कृत केवल फाउंडेशन विषय के तौर पर थी, जो वैकल्पिक विषय होने के कारण अमान्य है। आरटीआई में दिए गए जवाब में भी साफ है कि 17 सितंबर 1986 में प्रबंध संचालक ने अस्थायी रूप में नियुक्ति की थी। लेकिन मिलीभगत कर अस्थाई शब्द को स्थाई कर दिया गया।

अस्थाई नियुक्ति कर दी स्थाई
संजीव कुमार को 22 अप्रैल 1993 को सामाजिक विज्ञान के सहायक अध्यापक के तौर पर अस्थाई नियुक्ति दी गई। शर्त थी कि जैसे ही आयोग से स्थाई शिक्षक की नियुक्ति हो जाएगी, आपको हटा दिया जाएगा। 1996 में आयोग से हरेंद्र कुमार यादव की स्थाई नियुक्ति हुई, लेकिन संजीव कुमार ने पद नहीं छोड़ा।

उन्होंने तत्कालीन प्रधानाचार्य और प्रबंध समिति से मिलीभगत कर 2001 में स्थाई नियुक्ति पा ली। मामले में संजीव कुमार से बात करनी चाही, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।

बिना पद के किया नियुक्त
स्कूल में 1991 में लिपिक के पांच पद थे। सभी पदों पर कर्मचारी कार्यरत थे। फर्जी तरीके से छठा पद बढ़ाया गया। इस पर लिपिक प्रमोद कुमार को नियुक्त किया गया।

प्रधानाचार्य और प्रबंध समिति का खेल
ये नियुक्तियां तत्कालीन प्रधानाचार्य मनमोहन शर्मा के कार्यकाल में हुईं हैं। मनमोहन 1980 से 2001 तक प्रधानाचार्य रहे थे। प्रबंध समिति और प्रधानाचार्य के बिना नियुक्ति नहीं हो सकती थीं। इन्हीं की मदद से फर्जीवाड़ा हुआ है।

विज्ञापन तक नहीं किए जारी
प्रबंध समिति और प्रधानाचार्य अगर किसी पद पर नियुक्ति करते हैं तो पहले विज्ञापन जारी किया जाता है। लेकिन तीनों नियुक्तियों में विज्ञापन तक जारी नहीं किए गए।

रिकवरी की मांग उठाई  
तीनों ही कर्मचारियों की तैनाती 15 से 20 साल के बीच हो गई है। शिकायतकर्ता कुलदीप सिंह ने मुख्यमंत्री से रिकवरी की मांग की है। साथ ही तीनों के खिलाफ धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराने की बात कही है।

नियुक्ति में कई स्तर पर हुआ खेल
सीसीएसयू के समाजशास्त्र विभाग में एक असिस्टेंट प्रोफेसर की फर्जी नियुक्ति के मामले में कई स्तर पर खेल हुआ था। पीएचडी को जमा करने और नंबर जोड़ने में विवि के कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक जिम्मेदार हैं। शिक्षक से रिकवरी के लिए जल्द ही कार्य परिषद की बैठक में विचार होगा।

डॉ. प्रदीप कुमार ने समाजशास्त्र विभाग में तैनात अनिल कुमार की नियुक्ति फर्जी होने की शिकायत कुलाधिपति से की थी। कुलाधिपित ने नियुक्ति को फर्जी मानते हुए निरस्त करने के आदेश जारी कर दिए। साबित हो गया 17 नंबर गलत तरीके से देकर नियुक्ति की गई है।

मंगलवार को अनिल कुमार को कार्य मुक्त कर दिया। अहम सवाल यह है कि आवेदन मार्च 2014 में हुआ और पीएचडी जुलाई 2014 में जमा की गई। पीएचडी जमा कर अभिलेख में दर्ज करने वाला कौन शख्स था। यह काम अधिकारियों के दबाव में किया गया या फिर पैसे लेकर।

सूत्रों के मुताबिक एक बाबू ने यह काम किया। वह पहले भी फर्जीवाड़ों में शामिल रहा है। समाजशास्त्र विभाग में एक और कैंडीडेट की पीएचडी चुपके से बाद में जमा हुई थी। उसे विवि ने नोटिस दिया था।

डॉ. प्रदीप कुमार का कहना है कि फर्जीवाड़े में शामिल अधिकारी और कर्मचारियों को वह नहीं छोड़ेंगे। चाहे उन्हें कितनी भी लंबी लड़ाई क्यों न लड़नी पड़े। मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट में कैविएट भी दायर कर दी गई।
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