इससे पहले ही जमातें इस दृष्टिकोण से भी मुस्लिमों से बात कर चुकी होंगी। चालीस दिन की जमातें तेजी से लोगों के बीच पहुंचेंगी और जल्दी ही अपनी बात को मुस्लिमों के सामने रखेंगी। इज्तमा में जिन राजनीतिक पहलुओं को स्पष्ट रखा नहीं जा सकता, उन्हें जमाते साफ तौर पर मुस्लिमों के सामने रखेंगी। जमात में युवाओं की इस बार खासी भागीदारी होगी। चूंकि हर पार्टी पूरा फोकस युवाओं पर ही कर रही है तो जमातों में भी युवाओं की भागीदारी बढ़ना लाजिमी है।
चूंकि इसमें शामिल होने के लिए फिलहाल गांव-गांव, शहर-शहर से लोग रवाना हुए हैं तो उसका व्यापक असर जाने वाला है। ऐसे में जब जमाती फिर से जाकर बात करेंगे तो लोगों के जेहन पर इसका ज्यादा असर होगा। यह बात राजनीतिक दल भी भांप रहे हैं।
यही कारण है कि बसपा, सपा, कांग्रेस आदि दलों ने इज्तमा में शामिल हो रहे लोगों पर फोकस किया है। कहीं स्वागत हो रहे हैं तो कहीं अपने स्तर से बसों का इंतजाम करने की बात कही जा रही है। कहीं भोजन, मिठाई, फलों आदि का वितरण किया जा रहा है। चूंकि देश के चुनाव में मुस्लिम वोटरों का बड़ा योगदान है और इसी वर्ग पर कई दलों की निगाह है। ऐसे में इस आयोजन को राजनीतिक दल अपने ही नजरिए से देख रहे हैं।
कई पार्टियों का तो मुख्य वोट बैंक ही मुस्लिम है या फिर सोशल इंजीनियरिंग के सहारे मुस्लिम वोटरों पर सेंध लगाई जाती है। ऐसे में राजनीतिक दल भी इस इज्तमा को चुनाव पूर्व का रिहर्सल मान रहे हैं।
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