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कुदरत के खेल निराले: घर-घर नहीं, 'जेल-जेल' खेलते हैं ये बच्चे, कहानी ऐसी... दिल को छू जाएगी

Sat, 05 Aug 2023 06:46 PM IST
कपिल kapil विनीत तोमर, अमर उजाला, मेरठ

सार

Meerut News : ये मासूम न तो घर-घर खेलते न ही आंख-मिचौली। टीवी पर कार्टून भी नहीं देखते। इनका पसंदीदा खेल है जेल-जेल। ये कहानी आपके दिल को भी छू जाएगी।
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फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मेरठ में हत्या के आरोप में चौधरी चरण सिंह जिला कारागार में सजा काट रही 39 वर्षीय रोशनी का एक बेटा भी है। जब रोशनी को सजा हुई तब उसका बेटा बंटी तीन साल का था (मां, बेटे के काल्पनिक नाम)। बंटी तब से रोशनी के साथ जेल में ही रह रहा है। अब वह करीब साढ़े चार साल का हो गया है। खास बात यह कि बंटी की दिनचर्या भी सामान्य बच्चों की तरह है। वह स्कूल जाता है। उसकी मां उसे खाने का टिफिन भी देती है। लौटकर वह पढ़ता और बच्चों के साथ खेलता है।

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जेल में बंटी के अतिरिक्त छह बच्चे और हैं। लेकिन इनके खेल निराले हैं। ये मासूम न तो घर-घर खेलते न ही आंख-मिचौली। टीवी पर कार्टून भी नहीं देखते। इनका पसंदीदा खेल है जेल-जेल। जेल में तैनात पुलिसकर्मियों की खाकी वर्दी देखकर यह भी प्रभावित होते हैं। कोई बच्चा पुलिस वाला साहब बनता है और हाथ में खिलौना बंदूक लेकर चलता है, तो कोई बैरक के अंदर अपराधी बनकर खड़ा हो जाता है। पुलिस वाला बनकर एक-दूसरे से पूछताछ भी करते हैं। पूछताछ के नाम पर कोई एबीसीडी सुनता है तो कोई गिनती। उनकी यह अठखेलियां वहां पर बंद महिला बंदियों और सुरक्षाकर्मियों को भी गुदगुदाती रहती हैं।

हर बच्चे के जन्मदिन पर कटता है केक
इन सात बच्चों में दो बच्चियां हैं। जेल प्रशासन की तरफ से हर बच्चे का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाता है। जन्मदिन पर बच्चा मां के साथ केक काटता है। गुब्बारे और रंग-बिरंगे पेपर से डेकोरेशन किया जाता है। जिससे बच्चे को यह अहसास ही न हो कि वह घर से कहीं बाहर रह रहा है।

छह साल की उम्र के बाद जाना होगा घर
नियमानुसार जिला कारागार में महिला बंदियों के साथ रहने वाले बच्चों को छह साल की उम्र में अपने घर जाना होगा। यदि उसके अन्य परिजन नहीं हैं तो उसे बाल सुधार गृह में भेजा जाता है।

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समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है लक्ष्य : जेल अधीक्षक
जेल अधीक्षक शशिकांत मिश्र का कहना है कि यह बच्चे भले ही अपनी मां के साथ जेल के अंदर हो, लेकिन इन्हें हर वह सुविधाएं दी जा रही हैं जो सामान्य बच्चों को मिलती हैं। हाल ही में बच्चों का दाखिला एक निजी स्कूल में कराया गया, जिससे वह समाज की मुख्य धारा से जुड़ सकें। इसके अलावा उनके खाने-पीने और खेल-खिलौने आदि का पूरा बंदोबस्त है।

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