इस केक की कहानी किसी दंतकथा से कम नहीं। जाहिर है कि स्कॉटलैंड की स्कॉच वर्षों बैरल में पड़ी रहती है, वहीं मेरठ का रम केक सिर्फ 18 दिन में अपना जादू तैयार कर लेता है।
काजू, बादाम, पिस्ता, चेरी, किशमिश, संतरा और अनानास के छिलकों को साधारण रम में डुबोकर, फिर कीकर की लकड़ी की भट्टी में सलीके से सेका जाता है। कीकर का हल्का-सा धुआं ब्रेड और ड्राई फ्रूट्स में ऐसी खुशबू भर देता है कि पहली स्लाइस खाते ही दिल कह उठता है- वाह, यही तो असली क्रिसमस की महक है।
क्रिसमस के उल्लास में तैरने लगती है खुशबू
क्रिसमस के आसपास शहर का माहौल बदल जाता है। जहां हर बेकरी रेड वेलवेट और फ्रूट केक की चमक-दमक में लगी रहती है, वहीं असली रौनक इन परंपरागत रम केक की होती है।
मेरठ का क्रिसमस मतलब सांता केक, रम केक और कीकर की महक। यही यहां की असली पहचान है। शहर के हजारों लोग तो आज भी अपने घरों में बना केक लेकर बेकरियों की भट्टी पर सिकवाने आते हैं।
10 दिसंबर से ईसाई परिवारों में केक का आदान-प्रदान शुरू हो जाता है और हर घर में वही पुरानी खुशबू तैरने लगती है जो दशकों से मेरठ की गलियों में क्रिसमस की दस्तक बनकर फैलती रही है।