सुबूतों के अभाव में मुकदमे की नींव कमजोर पड़ रही है। यही वजह है कि अधिकांश मुकदमों में अभियुक्त को सजा नहीं हो पाती। पुलिस का तकनीकी पक्ष कमजोर होने से हत्या जैसे गंभीर अपराध में पोस्टमार्टम रिपोर्ट और प्रयुक्त हथियार का मिलान नहीं हो पाता। ऐसे में नामजद आरोपी बरी हो जाते हैं। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 32 हजार मुकदमे न्यायालय में विचाराधीन हैं।
नामजद आरोपियों के खिलाफ पुलिस कोर्ट में सुबूत ही नहीं पेश कर पाती। इसके चलते हत्या और दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में केस कमजोर पड़ जाता है। पुलिस आरोपी के मोबाइल की सीडीआर निकालते तक ही सीमित है। सीडीआर का प्रयोग पुलिस अपराधी व उसके साथियों को पकड़ने में करती है। मुकदमे की चार्जशीट को मजबूत करने के लिए सीडीआर की सीडी नहीं लगाती। यहीं वजह है कि सरेआम हत्या करने वाले अपराधी योगेश भदौड़ा, ऊधम सिंह, सुशील मूंछ, भरतू नाई, मोनू जाट को पुलिस सजा नहीं दिला पाई। चश्मदीद गवाहों को अपराधी डरा धमकाकर तोड़ लेते हैं और तकनीकी सिस्टम में पुलिस उनके खिलाफ पुख्ता सुबूत नहीं दे पाती।
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निगरानी शाखा भी तोड़ गई दम
हत्या, दुष्कर्म, अपहरण जैसे गंभीर अपराध में सुबूत जुटाने के लिए हर जिले में पुलिस ने मानीटरिंग सेल बनाई। यह निगरानी शाखा भी दम तोड़ गई। वहां कागजी खानापूर्ति के अलावा कुछ नहीं हो रहा। मानीटरिंग सेल प्रभारी ने शायद ही किसी मुकदमे में सुबूत जुटाकर विवेचना में शामिल कराया हो।
गंभीर अपराध में आरोपियों के खिलाफ तकनीकी प्रक्रिया और घटनास्थल से सुबूत जुटाने के निर्देश कप्तानों को दिए गए हैं। साक्ष्यों के साथ विवेचना हो, जिससे कोर्ट में मजबूत चार्जशीट जाए। हापुड़ जिले में एक बच्ची से दुष्कर्म के मामले में अपराधी को 42 दिन में सजा दिलाने का काम पुलिस ने किया था।
-राजीव सभरवाल, एडीजी, मेरठ जोन