पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान में इलाज कराना किसी भी मरीज के लिए अब सस्ता नहीं रह गया है। यहां पर अगर इलाज कराना है तो दवा और सर्जिकल आइटम बाहर से खरीदनी होगी। ऐसे हालात मेडिकल कॉलेज अस्पताल के हो चले हैं, जहां पर छोटे से ऑपरेशन का खर्च भी अपनी जेब से करना होगा।
दरअसल इसकी कई वजह हैं। सर्जरी के दौरान होने वाली दवा व अन्य आइटम (सर्जिकल आइटम) मेडिकल कालेज के पास उपलब्ध ही नहीं हैं। ऐसे जिस भी मरीज का ऑपरेशन होता है, उसे सामान लिखकर दे दिया जाता है। आलम यह है कि पित्त की थैली का ऑपरेशन करने पर भी मरीज को पांच से सात हजार रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़ रहे हैं, क्योंकि न एंटी बायोटिक दवायें उपलब्ध हैं और न ही ग्लूकोज की कंप्लीट डोज।
बीते दो माह से अस्पताल में दवाओं का टोटा है। मरीजों को चुनिंदा दवाओं के अलावा बाकी बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। खासी-जुकाम की स्थिति में भी मरीज को पूरे कॉम्बिनेशन के साथ दवाएं नहीं मिल पा रही है। अगर एंटी एलर्जी दवा मिल जाती है तो एंटी बायोटिक बाहर से लेनी पड़ती है। कभी पैरासिटामोल मिल जाती है तो एंटी एलजी व एंटी बायोटिक बाहर से लेनी पड़ती है। हैवी एंटीबायोटिक तो लंबे समय से खत्म हैं, जो सामान्य तौर पर उन मरीजों को देने की आवश्यकता पड़ती है जो सीरियस एलर्जी या जिनका ऑपरेशन किया गया हो। अब ऐसी ही स्थिति में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि मरीजों के लिए इलाज कराना खासा मुश्किल भरा है।
चुनिंदा मरीजों का ऑपरेशन
बाहर से सर्जिकल सामान व दवायें मंगाये जाने का असर सर्जरी के मरीजों पर भी पड़ रहा है। अब सिर्फ उन्हीं मरीजों का ऑपरेशन किया जा रहा है, जो अपने खर्च पर बाहर से दवा व अन्य सर्जिकल आइटम लेकर आ रहे हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा दिक्कत हड्डी के ऑपरेशन में आ रही है। क्योंकि उन्हें ज्यादा मोटा पैसा एक ऑपरेशन पर खर्च करना पड़ा रहा है।\
एक्सरे में बड़ी फिल्म नहीं
आलम यह है कि बीते एक माह से मेजर एक्सरे नहीं किये जा रहे हैं। खासकर पेट, चेस्ट व कमर के एक्सरे नहीं हो पा रहे हैं। क्योंकि बजट उपलब्ध न होने की स्थिति में बड़ी फिल्म एक्सरे वार्ड में उपलब्ध नहीं है। जबकि हर एक्सरे को छोटी फिल्म पर नहीं लिया जा सकता है। ऐसी स्थिति में चुनिंदा मरीजों के एक्सरे हो पा रहे हैं।