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मेडिकल में इलाज ‘राम भरोसे’, चिकित्सा सुविधाओं में कोई खास सुधार नहीं!

Wed, 04 Jan 2017 11:43 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज में मरीजों को मिली रही चिकित्सा सुविधाओं में कोई खास सुधार होता नहीं दिख रहा है। ओपीडी में चिकित्सक को दिखाना है तो लाइन में लगने के लिए मारामारी है और भर्ती होकर इलाज कराना हैै तो कोई समय पर देखने वाला नहीं है। कई वार्ड ऐसे भी हैं जहां पर हफ्तों तक पैरामेडिकल स्टाफ के हाथों ही मरीजों का इलाज चलता है। बीच में जेआर (जूनियर रेजीडेंट) राउंड ले लते हैं, लेकिन सीनियर चिकित्सक नहीं आते। मंगलवार को अमर उजाला की टीम ने मेडिकल कॉलेज की दौरा किया तो मरीजों की परेशानी सामने आई।
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मेडिकल कॉलेज में सोमवार और मंगलवार को मरीजों की काफी संख्या होती है। काउंटर पर पर्चा बनवाने के लिए ही दो घंटे तक लाइन में लगना पड़ता है। उसके बाद एक घंटे में ओपीडी और आधे घंटे में दवा काउंटर पर नंबर आता है। इसके बाद भी मरीज को इलाज मिल जाए इसकी कोई गारंटी नहीं है। 80 फीसदी दवायें मेडिकल में उपलब्ध ही नहीं है। ऊपर से अगर चिकित्सक एक्सरे या अल्ट्रासाउंड के लिए लिख दे तो और परेशानी बढ़ जाती है। क्योंकि एक्सरे बाहर से कराना होगा और अल्ट्रासाउंड के लिए फिर से लंबी लाइन में लगना पड़ेगा।

नहीं मिल पाई दवा
दोपहर 12:46 बजे मेडिकल कॉलेज के पर्चा काउंटर पर चार लाइनें लगी थीं। प्रत्येक लाइन में 50 से अधिक मरीज अपना पर्चा बनवाने के लिए लाइन में लगे थे। लाइन के लास्ट में खड़े मरीजों का पर्चा करीब एक घंटे के बाद बन पाया, उसके बाद 20 मिनट तक ओपीडी की लाइन में खड़े होकर डॉक्टर को दिखाया। इसके बाद दवा नहीं मिल पाई। क्योंकि दो बजे दवा काउंटर बंद हो गए थे और चिकित्सक को दिखाने में ही 2:10 बज गए थे।
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पैर में फ्रैक्चर, भर्ती फीमेल नेत्र वार्ड में
मेडिकल कॉलेज स्थित चिकित्सालय के टॉप फ्लोर पर फीमेल नेत्र वार्ड के अंदर पुरुष भर्ती है। खास बात यह है कि उसे नेत्र से जुड़ी कोई बीमारी नहीं है, बल्कि उसके पैर में फ्रैक्चर है। वार्ड में भर्ती बिहार निवासी फिरोज कहते हैं कि बीते डेढ़ महीने से यहीं पर भर्ती हूं। क्योंकि पैर में फ्रैक्चर है और ऑपरेशन भी होना है, लेकिन चिकित्सक डेट निर्धारित नहीं कर पा रहे हैं।  

घर से लाते हैं कंबल
टॉप फ्लोर के वार्ड का दूसरा नजारा यह भी है कि वार्ड के अंदर बेड तो हैं लेकिन उसके गद्दे फटे हैं और न ही उन पर कोई चादर है। मरीजों को चादर तो दी जाती है लेकिन रूटीन से चादर बदली नहीं जाती है। ठंड के मौसम में मरीज अस्पताल के कंबल में नहीं बल्कि अपने घरों से लाए कंबल व रजाई का इस्तेमाल कर रहे हैं।
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