एमबीबीएस इंटर्न संजीत सिंह की मौत के बाद से मेडिकल कॉलेज के हालात बेहद संवेदनशील हो चले हैं। आंदोलन तो संजीत को न्याय दिलाने की खातिर शुरू हुआ, लेकिन जूनियर डॉक्टरों के अड़ियल रवैये और सीनियर डॉक्टरों द्वारा मौन साधने का खामियाजा सीधे तौर पर मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
वर्चस्व की इस लड़ाई का प्रभाव अब सीधे तौर पर चिकित्सीय सेवाओं पर पड़ना शुरू हो गया है। रोजाना के हंगामे और आंदोलन से मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में लगातार कमी दर्ज की जा रही है।
वहीं, बीते पांच दिनों में ऑपरेशन/सर्जरी का औसत सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। हालात जल्द न सुधरे तो इसका असर ओपीडी पर भी पड़ना शुरू हो जाएगा। हालात आंकड़ों की जुबानी-
मरीजों में भर्ती का भय
400 मरीज औसतन भर्ती होते हैं मेडिकल कॉलेज अस्पताल में
1.20 लाख बैठती है महीने में औसतन मरीजों की यह संख्या
388 मरीज भर्ती थे 11 फरवरी को अस्पताल में
247 रही मरीजों की संख्या बुधवार (17 फरवरी) तक
800 रहती है सामान्य माहौल में मरीजों की संख्या (भर्ती और डिस्चार्ज के बीच)
थम रही सर्जरी की रफ्तार
40-50 सर्जरी होती हैं औसतन रोजाना मेडिकल अस्पताल में
1350 सर्जरी औसतन होती हैं हर माह अस्पताल में
41 सर्जरी हुई थीं कुल 11 फरवरी को अस्पताल में
46 सर्जरी हुई इन पांच दिनों में (12 से 16 फरवरी तक)
14 सर्जरी तो इनमें गायनिक वार्ड में की गई (डिलीवरी के दौरान)
(नोट : आंकड़े 12 फरवरी से 17 फरवरी दोपहर तक के हैं)
खास बात
11 फरवरी की रात को एमबीबीएस इंटर्न संजीत की मौत के बाद से जूनियर डॉक्टरों और एमबीबीएस छात्रों के बीच जमकर मारपीट और इमरजेंसी में तोड़फोड़ के बाद से हालात बिगड़े हैं।
बड़े आरोप यह हैं कि संजीत की मौत के पीछे जूनियर और सीनियर डॉक्टरों की लापरवाही रही। प्राचार्य ने माहौल काबू में रखने के लिए कार्रवाई का त्रिस्तरीय फार्मूला सामने रखा, लेकिन जूनियर डॉक्टर इसे मानने के बजाए ईएमओ डॉ. सचिन को हटाने की मांग पर अड़े हैं।
एमबीबीएस छात्र भी साथी की मौत पर बेहद खफा हैं। सीनियर डॉक्टरों पर भी अपने फर्ज को सही से न निभाने के आरोप लग रहे हैं। काम करने के बजाए मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रोजाना हंगामा हो रहा है। जिसका सीधा असर चिकित्सा सेवा पर पड़ रहा है। मरीज डरे हुए हैं और वहां जाने से कतराना शुरू हो गए हैं।
सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र का यह हाल
लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र का दर्जा प्राप्त है। यहां पश्चिम के कमोवेश सभी जिलों से मरीज रेफर होते हैं। इस मेडिकल कॉलेज का गौरवमयी इतिहास रहा है।
लेकिन पिछले कुछ समय से जूनियर डॉक्टरों द्वारा मरीजों और तीमारदारों से दुर्व्यवहार, मारपीट और उन्हें जबरन इमरजेंसी से बाहर निकालने के मामलों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।
यह भी आरोप लगे कि मेडिकल अस्पताल की इमरजेंसी में रात को मरीज भर्ती करने में आनाकानी होती है। कर भी लेते हैं तो तुरंत रेफर कर दिया जाता है।
मेडिकल कॉलेज एक नजर में
1040 बेड का है मेडिकल कॉलेज अस्पताल
25 बेड हैं इमरजेंसी में
150 जूनियर डॉक्टर है तैनात
120 स्पेशलिस्ट और सुपर स्पेशलिस्ट हैं सीनियर डॉक्टर
750 छात्र एमबीबीएस की कर रहे हैं पढ़ाई
सर्जरी का गणित
मेडिकल अस्पताल में आंदोलन के चलते माइनर सर्जरी का सिलसिला तो थम ही गया है। आपात स्थिति में ही मेजर सर्जरी हो रही है। इन पांच दिनों में सबसे ज्यादा सर्जरी गायनिक वार्ड में ही हुई हैं, जिसे रोका नहीं जा सकता। 12 फरवरी के बाद से हड्डी और ईएनटी विभाग में कोई ऑपरेशन नहीं हो पाया है।
हालांकि राहत की बात यह है कि गायनिक और बाल रोग विभाग में ट्रीटमेंट मिल रहा है। मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस छात्रों की भी पढ़ाई पर असर पड़ रहा है।
कोट
मेडिकल कॉलेज में मरीजों का इलाज सुचारु रखने के लिए सभी को आगे आना चाहिए था। सही मायने में यही संजीत को सच्ची श्रद्धांजलि होती। लेकिन जूनियर डॉक्टरों द्वारा अड़ियल रुख अपनाते हुए इलाज के बजाए कार्य बहिष्कार करना व्यवस्था को बिगाड़ने की सुनियोजित साजिश लगती है। सभी सीनियर चिकित्सकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे शैक्षिक कार्य के साथ अस्पताल में अतिरिक्त समय दें ताकि ऑपरेशन से लेकर मरीजों को देखने का काम ठीक ढंग से चल सके।
-डॉ. केके गुप्ता, प्राचार्य