एक नर्स के अनुसार पिछले सात दिनों में दंगे का जो दृश्य देखा उससे हम भी दहशत में आ गए। मेडिकल कालेज में बम फेंके जाने के बाद से तो ज्यादा ही असुरक्षा की भावना व्याप्त हो गई थी। पर, अब सब कुछ ठीक हो गया है। न डर है और न दहशत।
नर्स ने कहा कि हमारा तो काम ही है रोगियों की सेवा करना है। सब हिंदू-मुसलमान हो सकते हैं लेकिन हम नहीं हो सकते। अगर हम ही गलत कदम पर चल पड़े तो अस्पतालों से ही लोगों का विश्वास उठ जाएगा। कौन आएगा फिर यहां इलाज कराने?
इनका कहना था कि दंगे के बाद से यहां घायलों, लाशों से लदे ट्रक के ट्रक आ रहे हैं। जब ड्यूटी पोस्टमार्टम गृह के पास होती है तो वहां तो खड़ा भी नहीं हुआ जाता। खून खराबा देखकर आंखें भर आती। पर इससे होता क्या है? हमारा तो काम ही यह है। सब को देखो और इलाज करो। दंगे के बाद से वे पंद्रह-पंद्रह घंटे ड्यूटी दे रही थी। न उन्हें खाने का ही समय मिल पा रहा था और न सोने का ही।
मेडिकल कालेज में उस वक्त प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष की 60 सिस्टर, 180 छात्र-छात्राएं, 80 स्टाफ नर्स, 5 असिस्टेंट मैटरन, 1 मैटरन, एक चीफ मैटरन, 30 सुपरवाइजर और 12 ट्यूटर लगाई गई थीं। दंगे के चक्कर में इन सभी का हाल बेहाल हो गया। चीख-चिल्लाहट और रुदन भरे माहौल के बीच ये अपना फर्ज निभा रहे थे।
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