मेरठ विकास प्राधिकरण ने 20 हजार वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण किया और उसे भूल गया। नियोजन विभाग ने प्लानिंग की, तो भी इस जमीन को छोड़ दिया और बराबर से सड़क आदि निकाल दी। 40 करोड़ रुपये से ज्यादा की इस जमीन के दस्तावेज खंगाले गए, तो सभी के होश उड़ गए। अब तैयारी की जा रही है कि किसी भी तरह से इसका नियोजन किया जाए।
यहां हुआ खेल
1987 में एमडीए ने वेदव्यासपुरी योजना के लिए जमीन का अधिग्रहण किया था। इसी में गांव कुंडा की जमीन का भी अधिग्रहण किया गया। हैरत की बात यह रही कि यहां से ली गई काफी जमीन की प्लानिंग कर दी गई, पर रेलवे ट्रैक के पास 20 हजार वर्ग मीटर जमीन का नियोजन नहीं किया गया। शुरू में एमडीए ने यहां सीवर लाइन डालकर काम की शुरुआत भी की थी, पर जब वास्तविक धरातल पर योजना उतरी तो इस जमीन को भूल गए। नतीजा, यह जमीन खाली रह गई और उसके पास से सड़क निकल गई। यह जमीन पट्टी की तरह है।
अब होने लगा है कब्जा
जमीन छोड़ी ही इस तरह से गई कि लगता है एमडीए में इसका कोई इस्तेमाल नहीं होगा। गांव से जमीन सटी है, तो ऐसे में इस पर लगातार कब्जा हो रहा है। आशंका यह है कि कहीं इस पर शत प्रतिशत ही कब्जा न हो जाए। इसके बराबर में डिवाइडर रोड भी है।
दस्तावेज खंगाले तो मिला हिसाब
अब जमीन की तलाश की जा रही है। पता चला कि यह एमडीए की है, तो पहले तो अधिकारियों को यकीन नहीं हुआ। जब दस्तावेज खंगाले तो साफ हुआ। इसका मुआवजा भी किसानों को दिया जा चुका है। एमडीए वीसी योगेंद्र यादव ने इसका रिकार्ड तलब किया, तो पता चला कि इसकी प्लानिंग ही ठीक से नहीं की गई थी। अब बताया जा रहा है कि यह जमीन ग्रीन बेल्ट है। यदि ऐसा है तो भी इसे डेवलप किया जा सकता है। इस योजना में जहां अलग पार्क बनाए हैं, वहां इसी जमीन पर पार्क बनाए जा सकते थे। बोर्ड मीटिंग में प्रस्ताव पास कर इस जमीन पर सड़क भी बनाई जा सकती थी। लैंड यूज भी चेंज किया जा सकता था।
20 हजार रुपये वर्ग मीटर है रेट
वर्तमान में यहां लगभग 20 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर का रेट है। ऐसे में इस जमीन के दाम करीब 40 करोड़ रुपये हैं। दरअसल योजनाओं में ऐसी जमीन कई जगह है, जो एमडीए नियोजन अधिकारियों की लापरवाही के कारण ऐसे ही पड़ी है। सही तरीके से सर्वे हो तो एमडीए को ऐसी जमीन अन्य योजनाओं में भी मिल सकती है।
समस्या का कर सकती है समाधान
इस स्थिति में जबकि एमडीए को किसानों के मुआवजे के बदले जमीन देनी है, तो यह जमीन काफी किफायती साबित हो सकती है। दरअसल गंगानगर, लोहियानगर और वेदव्यासपुरी के किसानों के साथ एमडीए समझौते पर काम कर रहा है। किसानों को उनके प्रतिकर के बदले जमीन देनी है। यदि इस तरह की जमीनों का चिह्नीकरण किया जाए, तो एमडीए की बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है।
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