एमडीए के भ्रष्टाचार की पोल पुलिस जांच में खुल गई। एक ही प्लाट तीन बार अलग अलग नाम से आवंटित हुआ और तीनों ही बार वह निरस्त हुआ। पुलिस की विवेचना में एमडीए की परत दर परत खुलने लगी हैं। इस खेल में प्राधिकरण के 12 क्लर्कों की भूमिका संदिग्ध बताई गई है। पुलिस ने इन क्लर्कों को नोटिस जारी कर दिए हैं और अब मुकदमा दर्ज करने की तैयारी कर रही है। पुलिस का दावा है कि इस भ्रष्टाचार में विभागीय अफसर भी शामिल हैं। अमर उजाला पहले ही इस प्रकरण का भंडाफोड़ कर चुका है।
यह है मामला
एमडीए के प्रभारी संपत्ति अधिकारी पीएस मिश्रा ने 25 मार्च 2017 को सिविल लाइन थाने में सदर बाजार निवासी प्रॉपटी डीलर पुष्पेंद्र कुमार जैन के खिलाफ धोखाधड़ी का केस कराया था। आरोप था कि पुष्पेंद्र ने प्रभारी संपत्ति अधिकारी के फर्जी हस्ताक्षर कराकर पंजाब निवासी धर्मवती का शताब्दीनगर स्थित करोड़ों रुपये कीमत के प्लाट का बैनामा कराया था। इसकी जांच दरोगा श्यौदान सिंह को सौंपी है। पुलिस की जांच शुरू हुई तो मामला कहीं ज्यादा गंभीर निकला।
10 साल बाद कराया फर्जी बैनामा
विवेचक श्यौदान सिंह ने बताया कि एमडीए ने 1990 में यह प्लाट धर्मवती निवासी पंजाब के नाम आवंटित किया था। विभागीय क्लर्कों ने इसको निरस्त कराकर इसकी पूरी फाइल ही गायब कर दी। 2001 में यही प्लाट विकास कुमार के नाम आवंटित हुआ, जो कि 2006 में निरस्त किया गया। 2015 में फिर धर्मवती की पावर अटार्नी के आधार पर पुष्पेंद्र जैन ने इस जमीन का फर्जी बैनामा अपने नाम किया। इसकी जानकारी के बाद प्रभारी संपत्ति अधिकारी ने पुष्पेंद्र पर केस कराया।