सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए लिखा गया कि सिर्फ भीड़ में मौजूदगी से आरोप नहीं बन जाता है, जब तक कि विधि विरुद्ध जमाव का कोई उद्देश्य न हो। चोटिल होने से संबंधित मेडिकल रिपोर्ट भी सिद्ध नहीं हुई। किस आरोपी द्वारा किसकी हत्या की गई यह भी साबित नहीं हुआ।
न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट व मेडिकल रिपोर्टों को सिद्ध कराया गया, बल्कि गवाह शाहिद हसन, याकूब पुत्र नजीर ने अपने बयानों में कहा कि पुलिस और पीएसी वाले गोलियां चला रहे थे। वादी मुकदमा मोहम्मद याकूब ने घटना की एफआईआर स्वयं थानाध्यक्ष टीपीनगर द्वारा बोले जाने पर लिखना बताया। याकूब को हस्ताक्षर करने से पूर्व तहरीर पढ़कर भी नहीं सुनाई गई थी।
न्यायालय ने अपने निर्णय में उल्लेख किया कि पत्रावली पर ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे स्पष्ट हो कि किस अभियुक्त द्वारा कौन सा अपराध किया गया और किस अभियुक्त ने किस हथियार से वादी पक्ष पर हमला किया। न्यायालय ने घटना के तथ्यों, परिस्थितियों, पत्रावली में मौजूद मौखिक एवं लिखित साक्ष्य से घटना सिद्ध होना नहीं पाया। आरोपी इस केस में जमानत पर हैं, उनके द्वारा दाखिल व्यक्तिगत बंध पत्र और जमानत पत्र आगामी छह माह तक प्रभावी रहेंगे।
लूटी गई संपत्ति और हथियार बरामद नहीं हुए
न्यायालय ने अपने निर्णय में लिखा कि लूट की संपत्तियां और हथियार आरोपियों से बरामद नहीं हुए हैं, न ही हथियारों की बरामदगी आरोपियों से दर्शाई गई है। अभियोजन द्वारा पत्रावली पर किसी भी मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अथवा किसी भी चोटिल की मेडिकल रिपोर्ट साक्ष्य में विधि के अनुसार प्रस्तुत नहीं की गई। आरोपियों में कई नाम एेसे थे जो घटना से पहले ही मर चुके थे।