खाप और भाकियू खामोश
यहां खाप पंचायतों की खास भूमिका रही है। भाकियू मुख्यालय सिसौली भी इसी लोकसभा क्षेत्र में है। 2014 में खापों के मुखिया मुखर थे, इस बार नहीं। भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत खामोश हैं। माना जा रहा है कि अजित व बालियान के चुनाव मैदान में होने के कारण वह राजनीति से दूर हैं। सर्वखाप पंचायत के मुख्यालय शोरम भी चुनाव को लेकर एकमत नहीं है।
खास बातें
मुजफ्फरनगर की सभी पांच विधानसभा सीटें 2017 में भाजपा ने जीती थीं।
विधायक अवतार भड़ाना भाजपा छोड़ कांग्रेस में गए।
1971 में चौधरी चरण सिंह को भाकपा के विजय पाल सिंह ने यहां हराया था।
1989 में इस सीट से जनता दल के मुफ्ती मोहम्मद सईद चुने गए थे। वह केंद्र सरकार में गृहमंत्री बने थे।
नहीं घटा भाजपा का वोट
खतौली में मिले सोमवीर त्यागी व रामेश्वर शर्मा को लगता है कि इस बार फिर भाजपा जीतेगी। वे मानते हैं कि 2014 की तुलना में भाजपा के वोट बैंक में गिरावट नहीं आई है। अजित सिंह के आने के बावजूद क्षेत्र के 50 फीसदी जाट बालियान के साथ हैं।
अजित न आते तो पहले जैसी जीत होती
मंसूरपुर के निकट सोंटा गांव के चांदवीर कहते हैं, अजित नहीं आए होते तो बालियान की 2014 जैसी जीत होती। अजित सिंह का आखिरी चुनाव है, इसलिए वोट उन्हें देंगे। वह गांव में 75-80 जाटों का रुझान अजित के पक्ष में होने का दावा करते हैं। कपिल राठी कहते हैं, अजित ने ही चीनी मिलें लगवाईं, किसानों की लड़ाई लड़ी।
मुकाबला करीबी, दावा नहीं
बनत गांव के प्रदीप कहते हैं कि अजित ने आखिरी चुनाव की बात नहीं कही। यह उन्हें कमजोर करने के लिए कहा गया। वह बड़े नेता हैं, मुस्लिम व दलितों के साथ उन्हें 70 फीसदी जाट वोट मिलेंगे। विजय कुमार कहते हैं कि जब किसान यात्रा रोकी गई, किसानों पर लाठियां चलीं तो अजित ही आए थे। जाट कॉलोनी के विकास बालियान कहते हैं कि मुकाबला इतना करीबी है कि हार-जीत को लेकर दावा नहीं किया जा सकता। बालियान के पक्ष में मोदी लहर और दलितों व मुस्लिम मतों के बंटवारे की संभावना है।
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