फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

लोकसभा चुनाव में कितना कारगर होगा अजित सिंह का आखिरी दांव, पढ़िए- मुजफ्फरनगर की ग्राउंड रिपोर्ट

Tue, 09 Apr 2019 05:42 AM IST
गौरव द्विवेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
विज्ञापन
डॉ. संजीव बालियान और चौधरी अजित सिंह
विज्ञापन

पश्चिमी यूपी में गंगा-यमुना के दोआब की उपजाऊ धरती वाले मुजफ्फरनगर क्षेत्र में राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह व भाजपा उम्मीवार डॉ. संजीव बालियान के बीच सीधा मुकाबला है। बागपत से छह बार सांसद रहे अजित पहली बार मुजफ्फनगर में उतरे हैं। 2014 में चार लाख से ज्यादा मतों से जीते संजीव बालियान उन्हें कड़ी चुनौती दे रहे हैं। अजित कह चुके हैं कि उनका आखिरी चुनाव है। उनका यह दांव कितना कारगर होगा, यह तो नतीजे बताएंगे लेकिन इससे उन्हें सहानुभूति जरूर मिलती दिख रही है।

विज्ञापन


मुजफ्फरनगर की पहचान गन्ना, गुड़, पेपर, स्टील उद्योगों व किसान आंदोलनों के लिए रही है। 2013 में हुए दंगों के चलते पहचान बदल गई। दंगों के चलते 2014 में ऐसा ध्रुवीकरण हुआ कि परिणाम भाजपा के पक्ष में एकतरफा रहा। यहां बालियान 59 फीसदी वोट से जीते थे। केंद्र में मंत्री बनाये गए लेकिन 2016 में हटा दिए गए। अजित व बालियान, जाट हैं, इसलिए जाट वोट बंटा है।
  
मुजफ्फरनगर में डीएम आवास के पीछे अंबा बिहार निवासी सोशल वर्कर असद फारूखी कहते हैं कि अजित ने ढाई-तीन सालों में सामाजिक ताना-बाना एक करने के लिए काफी काम किया। उनके प्रति मुस्लिमों व दलितों के साथ 70 प्रतिशत से अधिक जाट मतदाताओं का रुझान है। यहां जब भी जाट-मुस्लिम मिलकर चलते हैं, लोकसभा चुनाव में कामयाबी मिलती है। चरथावल के मुस्तकीम मानते हैं कि गठबंधन के कारण अजित सिंह का पलड़ा भारी है।

विज्ञापन

खाप और भाकियू खामोश
यहां खाप पंचायतों की खास भूमिका रही है। भाकियू मुख्यालय सिसौली भी इसी लोकसभा क्षेत्र में है। 2014 में खापों के मुखिया मुखर थे, इस बार नहीं। भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत खामोश हैं। माना जा रहा है कि अजित व बालियान के चुनाव मैदान में होने के कारण वह राजनीति से दूर हैं। सर्वखाप पंचायत के मुख्यालय शोरम भी चुनाव को लेकर एकमत नहीं है। 

खास बातें
मुजफ्फरनगर की सभी पांच विधानसभा सीटें 2017 में भाजपा ने जीती थीं।
विधायक अवतार भड़ाना भाजपा छोड़ कांग्रेस में गए।
1971 में चौधरी चरण सिंह को भाकपा के विजय पाल सिंह ने यहां हराया था।
1989 में इस सीट से जनता दल के मुफ्ती मोहम्मद सईद चुने गए थे। वह केंद्र सरकार में गृहमंत्री बने थे।

नहीं घटा भाजपा का वोट
खतौली में मिले सोमवीर त्यागी व रामेश्वर शर्मा को लगता है कि इस बार फिर भाजपा जीतेगी। वे मानते हैं कि 2014 की तुलना में भाजपा के वोट बैंक में गिरावट नहीं आई है। अजित सिंह के आने के बावजूद क्षेत्र के 50 फीसदी जाट बालियान के साथ हैं।
विज्ञापन

अजित न आते तो पहले जैसी जीत होती
मंसूरपुर के निकट सोंटा गांव के चांदवीर कहते हैं, अजित नहीं आए होते तो बालियान की 2014 जैसी जीत होती। अजित सिंह का आखिरी चुनाव है, इसलिए वोट उन्हें देंगे। वह गांव में 75-80 जाटों का रुझान अजित के पक्ष में होने का दावा करते हैं। कपिल राठी कहते हैं, अजित ने ही चीनी मिलें लगवाईं, किसानों की लड़ाई लड़ी।

मुकाबला करीबी, दावा नहीं
बनत गांव के प्रदीप कहते हैं कि अजित ने आखिरी चुनाव की बात नहीं कही। यह उन्हें कमजोर करने के लिए कहा गया। वह बड़े नेता हैं, मुस्लिम व दलितों के साथ उन्हें 70 फीसदी जाट वोट मिलेंगे। विजय कुमार कहते हैं कि जब किसान यात्रा रोकी गई, किसानों पर लाठियां चलीं तो अजित ही आए थे। जाट कॉलोनी के विकास बालियान कहते हैं कि मुकाबला इतना करीबी है कि हार-जीत को लेकर दावा नहीं किया जा सकता। बालियान के पक्ष में मोदी लहर और दलितों व मुस्लिम मतों के बंटवारे की संभावना है।

शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें

https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें