हस्तिनापुर। लॉकडाउन होने से गंगा किनारे पलेज करने वाले किसान परेशान हैं। खरबूजा, तरबूज, खीरा आदि की फसलों के खरीददार कम होने से मंडी में अच्छा भाव नहीं मिल पा रहा है। जिसके चलते किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही है। बंडी मंडी तक नहीं पहुंचना भी घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
गंगा किनारे पलेज की खेती करने वाले किसानों के लिए आर्थिक दृष्टि से अप्रैल और मई माह विशेष होते हैं। किसान खरबूजा, तरबूज और खीरे की फसल तैयार करते हैं। जिसे दिल्ली सहित दूसरे राज्यों की मंडियों तक पहुंचाया जाता है। जिससे अच्छा भाव मिल पाता है। इन दिनों मखदूमपुर गंगा घाट के आसपास बड़े पैमाने में खीरा, तरबूज, खरबूज, ककड़ी, टमाटर की पलेज है। इन दिनों फल भी आने लगा है, लेकिन लॉकडाउन के चलते दूसरे राज्यों की मंडियों तक पहुंचाना मुश्किल हो रहा है। जिसके चलते किसान स्थानीय मंडियों में इन्हें बेच रहे हैं। किसानों की माने तों लाखों रुपये खर्च कर तैयार की गई पलेज इस बार घाटे का सौदा बन गई है। क्योंकि मंडियों में लोग कम पहुंचने के कारण ब्रिकी भी कम है। जिसके चलते दाम में भी भारी गिरावट है। खर्चा निकालना मुश्किल हो रहा है।
पहली बार देखी ऐसे स्थिति
मैंने अपनी जिंदगी में ऐसा लॉक डाउन या महामारी पहले कभी नहीं देखी। फसल का इतना मंदा रेट 40 वर्षों में पहली बार देखा हैं। किसानों को इस बार लागत के पैसे भी पूरे होना मुश्किल होता दिख रहा है। -बाबू
कैसे होगा गुजारा
पिछले साल खीरे के रेट 20 से 30 रुपये प्रतिकिलो मिले थे, लेकिन इस बार यह रेट 3 से 4 रुपये प्रतिकिलो है। इसी रेट में मंडी में खीरे की फसल बेचनी पड़ रही है। ऐसे में कैसे परिवार का गुजारा होगा। -अर्जुन सिंह
खर्च निकाला मुश्किल
मेरी उम्र लगभग 65 साल है। अपनी जिंदगी में कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी। इतनी मंदी फसल बिकती हुई पहली देख रहा हूं। जिन किसानों ने जमीन ठेके पर लेकर फसल लगाई थी उसका खर्च भी निकलना मुश्किल है। -बाबू सिंह
पूरी तरह है प्रभावित
गंगा किनारे गन्ने की 20 बीघा फसल पहले ही तबाह हो चुकी थी। इसके बाद प्लेज लगाने का विकल्प चुना तो मंदी की मार से हजारों रुपये का नुकसान होता दिखाई दे रहा है। ऐसे में लागत भी पूरी नहीं होगी। -अक्षय
हस्नितापुर खादर क्षेत्र में खरबूज की खेती।- फोटो : MAWANA
हस्तिनापुर खादर में खीरे की फसल उगाने वाला किसान।
हस्तिनापुर खादर क्षेत्र में खीरे की खेती। - फोटो : MAWANA