मेट्रो की ड्राफ्ट डीपीआर की समीक्षा के लिए लखनऊ मेट्रो रेल कारपोरेशन (एलएमआरसी) के एमडी कुमार केशव जब तक मेरठ मौके पर आकर उसका भौतिक सत्यापन नहीं करेंगे, तब तक मेरठ मेट्रो की डीपीआर फाइनल नहीं होगी। फिलहाल स्थानीय स्तर पर भी इस बाबत बैठक नहीं हो रही है। उधर, बताया यह जा रहा है कि लखनऊ में मेट्रो ट्रेन का निर्माणाधीन पिलर गिरने से एमडी लखनऊ में ही व्यस्त हैं और वे यहां नहीं आ पा रहे हैं। आम चर्चा यह है कि मेरठ की मेट्रो सियासी गलियारों में उलझ रही है।
मेरठ मेट्रो की ड्राफ्ट डीपीआर बने तीन माह हो चुके हैं
फाइनल डीपीआर बनने से पहले लखनऊ मेट्रो रेल कारपोरेशन के एमडी और इस प्रोजेक्ट के कोऑर्डिनेटर कुमार केशव को यहां आकर उसका सत्यापन करना है। यहां तकनीकी, भौगोलिक, आर्थिक रूप से इसकी जांच होगी। मौके पर जाकर टीम को यह देखना होगा कि ड्राफ्ट डीपीआर में क्या परिवर्तन करने जरूरी हैं।
इस बाबत मेरठ से अधिकारी कई बार एमडी से संपर्क कर चुके हैं, पर वह नहीं आ रहे हैं। दरअसल, इस पूरे मामले में तकनीकी पेंच यह है कि बिना उनके दौरे और सत्यापन के किसी भी सूरत में डीपीआर फाइनल नहीं हो सकती है। स्थानीय अधिकारी चाहकर भी इसे फाइनल नहीं कर सकते हैं। 22 अप्रैल को इस बाबत बैठक की बात भी हवाई ही साबित हुई। केवल औपचारिक चर्चा किसी प्वाइंट पर की जा सकती है।
सियासत में नहीं मिला बजट
उत्तर प्रदेश सरकार का बजट पेश होने के बाद मेरठ मेट्रो रेल की गति प्रभावित हो गई। इस बजट में प्रदेश सरकार ने कानपुर और वाराणसी को पचास-पचास करोड़ रुपया जारी कर दिया, जबकि मेरठ के हिस्से में कुछ नहीं आया। कहा यह जा रहा है कि एमडी एलएमआरसी भी केवल यह बहाना बना रहे हैं कि लखनऊ मेट्रो का पिलर गिरने से वह व्यस्त हैं। सही बात यह है कि वह भी बजट में कुछ न मिलने पर इधर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
चूंकि सूबे के लखनऊ, कानपुर, आगरा, मेरठ तथा वाराणसी में मेट्रो प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। लखनऊ में जमीनी स्तर पर काम शुरू हो चुका है जबकि बाकी जगह डीपीआर बनाई जा रही है। माना यह जा रहा था कि प्रदेश सरकार सभी स्थानों पर काम शुरू कराने के चक्कर में है ताकि अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव में इसका लाभ लिया जा सके।
बावजूद इसके अब ऐसा लग रहा है कि मेरठ को लेकर सरकार गंभीर नहीं है
माना जा रहा है सियासी दृष्टि से मेरठ को सरकार कमतर आंककर चल रही है। समाजवादी पार्टी थिंक टैंक वाराणसी और कानपुर पर जोर दे रहा है। वाराणसी तो तैयारियों में मेरठ से कहीं पीछे था, पर उसे बजट में पैसा दिया। पीएम नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण सपा वहां अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करना चाहती है। हालांकि मेरठ जिले की बात करें तो यहां तीन विधायक सपा के हैं। बावजूद इसके मेरठ को तरजीह नहीं दी जा रही है।