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43 घंटे में भी नहीं पकड़ा गया तेंदुआ, चार घायल

Thu, 14 Apr 2016 02:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
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तेंदुए को गोदाम से बाहर निकालने के लिए स्मोक कैंडल का प्रयोग भी काम न आया। - फोटो : अमर उजाला
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तेंदुआ अभी शहर में ही है। मंगलवार सुबह 7:30 बजे से करीब 43 घंटे गुजर जाने के बावजूद अभी तक वह पकड़ा नहीं जा सका है। बुधवार सुबह तेंदुआ हमलावर हो गया। फाजलपुर में निर्माणाधीन आर्मी ऑफिसर्स क्वार्टरों में काम कर रहे चार मजदूरों को घायल कर तेंदुआ सेना की मेस के गोदाम में जा छिपा। दिनभर उसे पकड़ने का अभियान चला, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। देर शाम रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया। बुधवार आधी करीब 2:30 बजे तक अमले ने तेंदुए की घेराबंदी कर रखी थी।
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मिलिट्री हॉस्पिटल में मंगलवार आधी रात ट्रैंकुलाइजेशन शॉट बेकार गया था। तेंदुआ इतनी फुर्ती से पेड़ से कूदकर भागा कि अफसर भी दंग रह गए। यहां से भागने के बाद तेंदुए ने करीब एक किमी दूरी पर फाजलपुर में आर्मी के निर्माणाधीन ऑफिसर्स क्वार्टर को अपना ठिकाना बना लिया। वह रात भर तीन नंबर ब्लॉक में रहा। बुधवार सुबह करीब 8 बजे जब मजदूर काम करने पहुंचे तो तेंदुए का पता चला। मजदूर मंगल सिंह ईंट ले जा रहा था तो उसकी नजर कमरे में मौजूद तेंदुए पर पड़ी। उसने मौका न देते हुए मंगल पर हमला बोल दिया। शोर मचने पर जब मजदूरों ने उसकी घेराबंदी की तो तेंदुए ने एक के बाद एक बबलू, संदीप और महेश को भी घायल कर डाला। सभी घायलों को सुभारती अस्पताल ले जाया गया।

आधी रात तक रेस्क्यू ऑपरेशन
तेंदुए द्वारा हमले करने की सूचना मिलते ही वन विभाग, पुलिस और प्रशासन का अमला मौके पर पहुंच गया। तीन नंबर क्वार्टर में करीब दो घंटे तक तेंदुए ने कूद-फांद की। यहां घेराबंदी होने पर करीब 15 फीट ऊंची फेंसिंग को लांघकर तेंदुआ 60 इंजीनियर्स जेसीओ मेस के एक पुराने गोदाम में जा छिपा। पुलिस, वन विभाग और सेना ने चारों ओर बैरीकेडिंग करते हुए गोदाम के एंट्री और एग्जिट प्वाइंट पर जाल लगा दिया।
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मौके पर डीआईजी लक्ष्मी सिंह, डीएम पंकज यादव, एसएसपी डीसी दूबे, मुख्य वन संरक्षक मुकेश कुमार, डीएफओ मनीष मित्तल भी पहुंच गए। दुधवा नेशनल पार्क से आई डब्लूटीआई (वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया) की टीम के नेतृत्व में शाम करीब छह बजे रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया। गोदाम में पिंजरा लगाते हुए तेंदुए के लिए मुर्गे का गोश्त मंगाया गया। आधी रात करीब ढाई बजे तक तेंदुए के पिंजरे में जाने का इंतजार होता रहा। समाचार लिखे जाने तक सेना, पुलिस, वन विभाग ने मोर्चा संभाल रखा था।
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