घर के लिए रवाना हुए मजदूर
मेरठ। शहर में मौजूद मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाने के प्रयासों में प्रशासन जुटा हुआ है। शुक्रवार को मजदूरों को उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में भेजा गया। इसमें सबसे अधिक आजमगढ़, मऊ आदि शहरों के मजदूर परिवार थे। नोडल अधिकारी/एमडीए सचिव प्रवीणा अग्रवाल ने खुद मौके पर पहुंचकर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराते हुए मजदूरों को रवाना किया।
मेरठ रोडवेज रीजन की 22 बसों से 603 मजदूरों को शुक्रवार को कंकरखेड़ा स्थित कोशा रिजॉर्ट से रवाना किया गया। यह सभी बसें इन मजदूरों को उनके गृह जनपद आजमगढ़, बलिया, मऊ, आंबेडकरनगर, हरदोई आदि में छोड़ेंगी। सभी मजदूरों की बस स्टैंड पर मेडिकल जांच की गई। उन्हें खाने-पीने की सामग्री भी दी गई। आरएम नीरज सक्सेना ने बताया कि बृहस्पतिवार को पांच बसों से 110 प्रवासियों को राजस्थान के भरतपुर छुड़वाया था। शुक्रवार को मेरठ डिपो की 15 और सोहराब गेट डिपो की सात बसों से 603 मजदूरों को उनके गंतव्य की ओर रवाना किया। अभी तक 1500 से अधिक मजदूरों ने घर जाने के लिए एमडीए स्थित कंट्रोल रूम में अपना नाम लिखवाया है। वहीं, ई-मेल पर भी सूची आ रही है। शनिवार को हरियाणा के लिए बसें भेजने का इंतजाम किया गया है। एमडीए सचिव प्रवीणा ने बताया कि बसों में एक सीट पर एक ही यात्री को बैठने की अनुमति दी गई है।
मजदूरों की घर वापसी जारी
लॉकडाउन में फंसे लोगों की घर वापसी जारी है। बृहस्पतिवार को पंजाब, गुजरात और हरियाणा आदि राज्यों में फंसे 15 कामगार रोडवेज की छह बसों से भैसाली अड्डे पहुंचे। इन सभी का अड्डे पर ही स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। कोरोना वायरस के लक्षण नहीं मिलने पर सभी को होम क्वारंटीन के लिए घर भेज दिया। यह जानकारी स्टेशन अधीक्षक शिवदत्त सारस्वत ने दी।
- बसों के इंतजार में मजदूर काट रहे चक्कर
मेरठ। लॉकडाउन में भले ही प्रशासन दावे करे कि मजदूरों को लेकर कोई परेशानी नहीं होने दी जा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि दूरदराज के मजदूरों के सामने परेशानी कम नहीं हैं। कहीं रोडवेज बस अड्डे पर मजदूर बसों के लिए भटकते मिले तो कहीं 10 दिन से पैदल चलकर यहां पहुंचे मजदूर आगे भी पैदल ही चलकर जाने को मजबूर हैं। मध्यप्रदेश के मुरैना निवासी रमेश सात-आठ लोगों के साथ रुड़की में एक फैक्ट्री में काम करता है। रमेश ने बताया कि एक महीने तक रुड़की में बहुत परेशानी झेली। फैक्ट्री बंद हो चुकी है। परिवार व अन्य लोगों के साथ पैदल ही अपने घर की तरफ जा रहा है। तीन दिन से पैदल चल रहे हैं। आखिरी उम्मीद है कि किसी तरह घर नसीब हो जाए। गाजीपुर निवासी फिरोज और हैदर ने बताया कि वह हापुड़ रोड पर मेरठ में धागा फैक्ट्री में काम करते थे। फैक्ट्री बंद होने पर राशन की समस्या सामने आई। कई दिन भोजन मांगकर भी खाया। अब घर जाना चाहते हैं। सुबह से रोडवेज बस के लिए भटक रहे हैं। बिहार निवासी मुल्तान, सिराज, अखलाक और अन्य लोगों ने बताया कि लिसाड़ी गेट में वह रहे थे, लेकिन अब वह पूरा इलाका सील कर दिया गया है। कोई साधन नहीं मिला तो पैदल ही घर के लिए चल दिए।
कोरोना का तो पता नहीं, लेकिन घर नहीं गए तो भूख मार देगी
- पंजाब के लुधियाना से मध्यप्रदेश लौट रहे मजूदूरों ने बयां किया दर्द
मोहित कुमार
गंगानगर। साहब परिवार का पेट पालने के लिए घर से सैकड़ों किमी दूर रहकर मेहनत मजदूरी करते थे। दिनभर मेहनत कर जो मिलता था उसी से अपना और अपने परिवार का पेट भरते थे। जो कुछ जमा पूंजी बची थी, वह खत्म हो गई, ऐसे में घर नहीं पहुंचे तो भूख मार देगी। यह कहना है लुधियाना से पैदल ही घर के लिए निकले मजदूरों का। इनका घर मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में है। मवाना रोड पर आराम करने के लिए 22 मजदूर रुके थे।
लक्ष्मीदीन ने बताया कि वह कुछ माह पहले ही लुधियाना गए थे। वहां एक ईंट भट्ठा पर काम मिला था। लॉकडाउन से पहले तक सब ठीक था, दिनभर मेहनत कर परिवार के लिए दो जून की रोटी का इंतजाम कर लेते थे, लेकिन लॉकडाउन हुआ तो सब ठप हो गया। नीलकंठ ने बताया कि भट्ठा मालिक ने मार्च तक का पेमेंट कर घर जाने को बोल दिया। जो पैसा मिला था वह भी खत्म हो गया। अब जेब में एक फूटी कौड़ी नहीं बची। यदि रास्ते में कुछ खाने को मिल जाता है तो खा लेते हैं, नहीं तो ऐसे ही दिनभर भूखे पेट रहकर सफर तय करते हैं, लेकिन अब यह बर्दाश्त से बाहर हो गया है। घर नहीं पहुंचे तो भूख के कारण मर जाएंगे।
- 700 किमी का सफर और बचा
नत्थू प्रसाद और शिवकुमार के मुताबिक, 700 किमी का सफर अभी उन्हें और तय करना है। घर पहुंचने के लिए लुधियाना के साथ ही मेरठ प्रशासन से भी गुहार लगाई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। सीताराम और राजेंद्र ने बताया कि रास्ते में कई जगह उन्हें खाना तो मिल गया, लेकिन किसी ने भी मोबाइल तक चार्ज नहीं करने दिया। ऐसे में परिजनों से बात भी नहीं कर पा रहे हैं।