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कांवड़ यात्रा: कांवड़ियों के साथ परिजनों को भी करना होता है परहेज, ऐसा करने से मिलता है पूरा फल

Mon, 06 Aug 2018 04:08 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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कांवड़ यात्रा 2018 - फोटो : अमर उजाला
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कांवड़ यात्रा के दौरान हरिद्वार से कंधे पर गंगाजल लेकर विभिन्न स्थानों पर शिव मंदिरों में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा है। कहा जाता है कि पहली बार रावण ने कांवड़ उठाई थी। यह भी माना जाता है कि भगवान राम ने भी शिव को प्रसन्न करने के लिए कांवड़ के साथ जलाभिषेक किया था।
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बताया जाता है कि सावन माह में शिव अपने भक्तों से जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। भक्त इस माह में कावंड लाकर शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाकर उन्हें प्रसन्न करते हैं। कहा जाता है कि ऐसा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस यात्रा के दौरान कई नियमों का पालन करना होता है जिन्हें पूरा करने से यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। 
 

आइए जानते हैं कि कांवड़ यात्रा के दौरान किन चीजों का ध्यान रखना आवश्यक बताया गया है :-

 

कांवड़ यात्रा में ध्यान रखनी होती हैं ये बातें

कांवड़ यात्रा 2018 - फोटो : अमर उजाला
कांवड़ लेने गए भोले के भक्तों को यात्रा मार्ग में बहुत सी सावधानियां और परहेज रखने पड़ते हैं। इस दौरान प्रत्येक कांवड़िया कई संकल्प करता है जिन्हें उसे पूरी यात्रा के दौरान निभाना पड़ता है। कांवड़ लाने वाले व्यक्ति को यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा, मांस, मदिरा व तामसिक भोजन करना वर्जित है। इसके अलावा चमड़े की वस्तुओं का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता।

कहा जाता है कि शिवभक्त कांवड़ यात्रा पूरी करता है उसे अश्वमेघ यज्ञ करने जितना फल प्राप्त होता है। हरिद्वार से जल लाकर ज्योर्तिलिंग पर चढ़ाने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। खास बात यह है कि इस यात्रा के दौरान गंगाजल लाने से लेकर जलाभिषेक करने तक का यह सफर नंगे पांव ही पूरा करना होता है। कांवड़ यात्रा के दौरान शिवभक्त पूरे रास्ते भोलेनाथ के नाम के जयकारे लगाते हैं और बम-बम का उच्चारण करते हुए जाते हैं। कहा जाता है कि यात्रा के दौरान लगातार बोल-बम का जयघोष करना काफी फलदाई होता है।  

 
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परिजनों को भी कांवड़ यात्रा के दौरान करना होता है परहेज 

कांवड़ यात्रा 2018 - फोटो : अमर उजाला
कांवड़ियों और उनके परिवार के सदस्यों के द्वारा तामसिक भोजन का परहेज किया जाता है। यात्रा पूर्ण होने तक घर पर दाल, सब्जी में छौंका यानी तड़कानहीं लगता है। तवे पर रोटी को फूलने नहीं दिया जाता है, घर में सिलाई, कड़ाई का कार्य नहीं किया जाता। वहीं कांवड़ियों के लिए ध्रूमपान, शेविंग, शीश देखना, चमड़े की वस्तुएं, साबुन, तेल, कंघे के साथ कुर्सी, वाहन, चारपाई, पलंग पर बैठना निषेध माना जाता है।

यही नहीं रोटी को चपाती, मिर्च को लंका, चप्पल को खड़ाऊ, नहाने को स्नान, लोटे को सागर, कपड़ों को वस्त्र, कुत्ते को भैरव पुकारा जाता है। जहां कांवड़ रखी होती है, उस स्थान से ऊपर नहीं बैठ सकते नही। जमीन पर सोना होता है।

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