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कारगिल विजय दिवस: हाथ गंवाकर भी पीछे नहीं हटे मोहम्मद असद, ऑपरेशन पूरा कर संजीव ने लिए थे सात फेरे

Sun, 26 Jul 2020 01:57 AM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिजनौर
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कर्नल आरएस सिरोही, संजीव कुमार (सेना मेडल) - फोटो : अमर उजाला
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उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के कई सैनिकों ने कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लोहा लिया। इस युद्ध में जिले के गांव फीना निवासी नायक अशोक कुमार शहीद हुए थे वहीं जनपद के ही जांबाज सैनिक मोहम्मद असद ने अपना बायां हाथ गंवाया था। संजीव कुमार ने राजौरी सेक्टर में आतंकवादियों को मारकर दुश्मनों से देश की रक्षा की थी।

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कारगिल युद्ध को ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है। भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है। पाकिस्तान की सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा पार करके भारत की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की।

पाकिस्तान ने दावा किया कि लड़ने वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेजों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी।
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लगभग 30 हजार भारतीय सैनिक इस युद्ध में शामिल थे, जिन्होंने पांच हजार से ज्यादा घुसपैठियों को खदेड़ दिया था। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाली जगहों पर हमला किया और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से पाकिस्तान को सीमा पार वापस जाने को मजबूर किया।

यह युद्ध ऊंचाई वाले इलाके पर हुआ और दोनों देशों की सेनाओं को लड़ने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। परमाणु बम बनाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ यह पहला सशस्त्र संघर्ष था। अंततः भारत ने कारगिल युद्ध जीता।

कारगिल के युद्ध का हिस्सा बने वीरों की कहानी उन्हीं की जुबानी:-
बायां हाथ गंवाकर लिया दुश्मनों से लोहा
18 गढ़वाल रायफल्स में तैनात रहे मोहम्मद असद बताते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान जब मैं दराल सैक्टर में तैनात था, तब 13 जून को टोरोलिंग पहाड़ी पर कब्जे के दौरान मेरे ऊपर मोर्टार बम आकर गिरा, जिससे मेरा बायां हाथ उड़ गया और पूरा शरीर लहूलुहान हो गया था। मुझे सैनिक अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस हादसे के दौरान हमने पाकिस्तानी फौजियों की दो चौकियां घेर रखी थीं।

पहाड़ियों वाले रास्ते से लगभग 14 किमी की दूरी तय कर मेरे साथियों ने मुझे सैनिक अस्पताल पहुंचाया था। हॉस्पिटल पहुंचने में करीब पांच से सात घंटे लगे थे। लगातार खून बह रहा था और एक बार तो मेरे साथी घबरा गए थे। लगभग एक सप्ताह बाद दिल्ली और फिर पूना में इलाज हुआ। साल 2000 में मेडिकल के आधार सेवानिवृत्ति दे दी गई थी। वर्तमान में मुरादाबाद रोड पर कारगिल प्वाइंट फिलिंग स्टेशन पेट्रोल पंप है।

अग्रिम मोर्चे पर तैनात जवानों को पहुंचाया गोला बारूद
बिजनौर निवासी सूबेदार मेजर अरविंद वर्मा ने बताया कि मैं 1978 में सेना आयुध कोर में भर्ती हुुआ था। मैं लड़ने के लिए गोला बारूद और हथियार आदि युद्ध क्षेत्र की अग्रिम पंक्ति तक पहुंचाने का कार्य करता था। उन्होंने बताया कि उस समय श्रीनगर के पास सेना का गोला, बारूद और हथियार एकत्रित करने के लिए गुप्त स्थल बनाया गया था। लगभग 700 सैनिकों की उस टुकड़ी में मैं भी शामिल था, जो अग्रिम मोर्चे पर तैनात सेना की टुकड़ी को गोला बारूद और हथियार उपलब्ध कराती थी।

कभी रातोंरात हेलीकॉप्टर के द्वारा दुर्गम स्थानों पर गोला बारूद भेजा जाता था, तो कभी दिन में ही सड़क मार्ग से, युद्ध शुरू होने पर भारत के विभिन्न आयुध डिपो से सैनिक एकत्र हुआ करते थे। मेरा परिवार भी वहीं पर फंस गया था। एक तरफ देश की रक्षा का संकल्प तथा दूसरी ओर परिवार की चिंता ने मुझे थोड़ा परेशान जरूर किया, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी। परिवार को बहुत कम समय में ही जम्मू तक छोड़ा गया और जम्मू से स्यालदाह एक्सप्रेस ट्रेन से नजीबाबाद स्टेशन तक आए थे।

बारूदी सुरंगों ने पहुंचाया था काफी नुकसान 
58 इंजीनियर रेजीमेंट में तैनात रहे हवलदार टीकम सिंह का कहना है कि मैं उड़ी सेक्टर की बॉर्डर लाइन पर बारूदी सुरंग लगाने का कार्य करने की टीम में शामिल था। इस दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंगों को ध्वस्त करने का भी काम किया। सुरंगों को हटाने के काम में हमारी यूनिट को काफी नुकसान हुआ था।

मैं भी उस टीम का हिस्सा था, वे और उनके साथी घबराए नहीं बल्कि हिम्मत से काम लिया और हमारी टीम ने पाकिस्तानी सेना को धूल चटाकर विजय पताका फहराई। हम अपनी जान की परवाह किए बिना लगातार आतंकियों से लोहा ले रहे थे। इसी दौरान मेरे एक साथी को हाथ में चोट लगी थी, लेकिन उसने भी हिम्मत नहीं हारी। सभी की एकजुटता और भारत माता के प्रति सच्ची लगन होने से हमने विजय पताका फहराई। 

अपने दोनों बेटों और दामाद पर गर्व है
गांव कासमाबाद बूढ़नपुर स्योहारा कैप्टन ओमप्रकाश सिंह राजौरी सेक्टर में एलओसी के पास स्थित मेंढर सेक्टर में लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) में भाग लिया। मैं पांच राजपूताना रायफल में तैनात रहा। लगातार पाकिस्तानियों की ओर से फायरिंग की जा रही थी औ गोला बारूद दागे जा रहे थे। हमने भी पाकिस्तानियों का उनके ही अंदाज में जवाब दिया।

पाकिस्तानियों की ओर से जा रही फायरिंग के दौरान एक गोली मेरे दाएं कान को छूकर निकली, लेकिन न तो मुझे और न ही मेरे साथियों को नुकसान हुआ। लगातार युद्ध के दौरान 26 जुलाई को विजय पताका फहराई गई। मेरी और मेरे साथियों के जज्बे को देखकर मेरे दोनों पुत्रों ने सेना में जाकर भारत माता की रक्षा करने का संकल्प लिया। वर्तमान में मेरे दोनों पुत्र और दामाद सेना में हैं। मुझे उन पर गर्व है कि वे मेरे नक्शेकदम पर चलकर ही देश सेवा को समर्पित हैं।
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मुठभेड़ में आतंकियों को मारने पर मिला था सेना मेडल
मूलरूप से कालागढ़ निवासी संजीव कुमार (सेना मेडल) 15 गढ़वाल रायफल्स में मई 1991 में भर्ती हुए थे। मैंने ऑपरेशन सर्प विनाश के दौरान आतंकियों से हुई मुठभेड़ में दो आतंकियों को मार गिराया था।

परिस्थितियां विपरीत थीं, करीब 13 हजार फीट की ऊंचाई पर राजौरी सैक्टर के काका हिल पहाड़ी में घने जंगल और ऊंची पहाड़ी पर आतंकियों से लोहा लिया और सफलतापूर्वक ऑपरेशन को मुकाम तक पहुंचाया। कारगिल युद्ध के दौरान नौसेरा सेक्टर में तैनात रहा।

वर्ष 2003 में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित होने के बाद थल सेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह ने वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था। इससे पूर्व मेरे घर वालों ने मेरी शादी तय कर दी थी।

30 अप्रैल सन 1999 को उनकी शादी होनी थी, लेकिन वह लग्न-रिश्ता कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाए थे। मेरे घर और ससुराल वालों ने मेरी आस छोड़ दी थी, लेकिन मैं अपनी शादी से एक दिन पहले अपने घर पर पहुंचा तो सभी अचंभित रह गए। घर और गांव वालों तथा ससुराल वालों ने मुझे बहुत स्नेह किया। 
   
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