सबसे अहम था बसपा वोटरों का रुख। गौर करें! बसपा सुप्रीमो ने महागठबंधन के प्रत्याशी को समर्थन देने की कोई विधिवत घोषणा नहीं की थी। बावजूद इसके दलित वोटरों ने कैराना में रालोद और नूरपुर में सपा प्रत्याशी को जमकर वोट किया। यह बसपा सुप्रीमो का साइलेंट मेसेज था। कर्नाटक में सरकार गठन के समय सोनिया गांधी के साथ गर्मजोशी से मुलाकात तो साथ ही अखिलेश यादव, चौधरी अजित सिंह के साथ भी दोस्ताना व्यवहार बसपाई वोटरों को हरी झंडी दे गया। ऐसे में दलितों ने जमकर भाजपा के विरोध में वोट किया।
ऐसे तो गठबंधन बदल देगा खेल
भाजपा को वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में वर्ष 2009 के चुनाव से 25 प्रतिशत वोट ज्यादा मिले थे। 2009 में उसे 17.5 प्रतिशत वोटों के साथ कुल दस सीटें मिली थीं। वहीं 2014 में 42.3 प्रतिशत वोट के साथ सीटों की संख्या 70 के पार पहुंच गई। इसका एक बड़ा कारण था दूसरे दलों का अलग-अलग छिटकना। बसपा का सात प्रतिशत वोट कम रह गया था। मुस्लिम वोटर सपा के साथ गया। यानी बसपा, सपा और कांग्रेस के वोट अलग थलग होने के कारण बेअसर ही रहा। कैराना चुनाव ने यह समझा दिया कि इन वोटरों को यदि एक कर दिया जाए तभी भाजपा को रोका जा सकता है। रही सही कसर वेस्ट में बड़ी ताकत माने जाने वाले रालोद ने पूरी कर दी। वेस्ट यूपी की दस सीटों पर रालोद का बड़ा प्रभाव है। दलित, मुस्लिम केसाथ जाटों द्वारा रचा गया व्यूह तोड़ पाना मुश्किल होगा। चूंकि इस चुनाव में यह साफ हो गया है कि मुस्लिम एक साथ वोट करेगा तो परिणाम दूसरे के साथ मिलकर बदल ही देगा। चूंकि इस चुनाव में मुस्लिमों का उत्साह देखते ही बना।
इस बार उल्टा
हिंदुत्व के नाम पर भाजपा पिछले चुनाव में मतदाताओं को साधती आई है। जाटों के अलावा दलितों ने भी पिछले चुनाव में भाजपा को वोट किया। चाहे कैराना पलायन का मुद्दा हो या सचिन गौरव हत्या का प्रकरण या फिर बिजनौर के पेद्दा कांड के आरोपियों को टिकट देना। इस तरह के मुद्दे इस चुनाव में गौण होकर रह गए।
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