फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बदल गया यूपी का मिजाज, भाजपा के लिए चुनौती बना गठजोड़, ऐसे मिली बड़ी जीत

Fri, 01 Jun 2018 06:27 PM IST
यूपी अमर उजाला ब्यूरो, अमित मुदगल, मेरठ
विज्ञापन
फाइल फोटो
विज्ञापन

वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव बेशक अलग अंदाज का था। ऐसी बयार बही कि भाजपा सिरमौर हो गई। वर्ष 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी वेस्ट यूपी को ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला बनाकर भाजपा ने अपनी रणनीति तय की और सूबे में भगवा परचम लहराने में सफलता हासिल कर ली। दोनों ही चुनावों में नीति एक ही रखी गई। यहां तक दोनों ही चुनावों में भाजपा के तारणहार नरेन्द्र मोदी ने अपनी रैलियों तक के लिए एक सी जगहों और मैदानों को चुना। बात बन गई लेकिन अब कैराना और नूरपुर के उपचुनाव में वेस्ट यूपी बदला हुआ था। ध्रुवीकरण की काट का मंत्र खोजा गया महागठबंधन के सहारे। इसमें समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बसपा और रालोद मुख्य रूप से शामिल रहे। नीति के तहत ही सपा नेता को रालोद के चिह्न पर चुनाव लड़ाया गया। प्रयोग सफल रहा...

विज्ञापन


‘दरहम, बरहम दोनों सोचें
जख्म का मरहम दोनों सोचें
सोचें ! लेकिन दोनों सोचें।’

दरहम यानी भटके हुए और बरहम यानी बिखरे हुए। मशहूर शायर डा. नवाज देवबंदी ने भले ही अपना यह दर्द किसी भी मिजाज में उकेरा हो लेकिन कैराना चुनाव में जैसे इन्हीं पंक्तियों से महागठबंधन ने अपनी जीत की पटकथा लिख दी। यह केवल कैराना या नूरपुर का उपचुनाव नहीं था। न ही कैराना के जरिए एक साल तक  देश की बड़ी पंचायत में प्रतिनिधित्व करने की ललक। यह पश्चिमी यूपी में सियासी रण के लिए तैयार किए गए चक्रव्यूह का यह ऐसा अनूठा प्रयोग था जो लोकसभा चुनाव के लिए तैयार किया गया।

सबसे अहम रहा बिखरे वोटों को समेटना। रूठों के मनाने का। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से रूठे मुस्लिमों को चौधरी अजित सिंह ने मनाया। जो बिखरे हुए थे उन्हें समेटा। परिणाम उनकी आशा के अनुरूप निकला। इन चुनावों के परिणामों ने यह साफ कर दिया कि यदि सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद का यह गठबंधन इसी नीति केसाथ लोकसभा चुनाव में उतरा तो भाजपा का इस चक्रव्यूह से निकलना आसान नहीं होगा। यहां सबसे खास बात यह रही कि इन सभी दलों ने खास मंथन इस पर किया कि जीत कैसे होगी? कैराना में सपा ने अपना बैनर त्यागकर लगाम रालोद के हाथ में दी। कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत लगाई।

विज्ञापन
विज्ञापन

बसपा का था साइलेंट गेम

फाइल फोटो
सबसे अहम था बसपा वोटरों का रुख। गौर करें! बसपा सुप्रीमो ने महागठबंधन के प्रत्याशी को समर्थन देने की कोई विधिवत घोषणा नहीं की थी। बावजूद इसके दलित वोटरों ने कैराना में रालोद और नूरपुर में सपा प्रत्याशी को जमकर वोट किया। यह बसपा सुप्रीमो का साइलेंट मेसेज था। कर्नाटक में सरकार गठन के समय सोनिया गांधी के साथ गर्मजोशी से मुलाकात तो साथ ही अखिलेश यादव, चौधरी अजित सिंह के साथ भी दोस्ताना व्यवहार बसपाई वोटरों को हरी झंडी दे गया। ऐसे में दलितों ने जमकर भाजपा के विरोध में वोट किया।

ऐसे तो गठबंधन बदल देगा खेल
भाजपा को वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में वर्ष 2009 के चुनाव से 25 प्रतिशत वोट ज्यादा मिले थे। 2009 में उसे 17.5 प्रतिशत वोटों के साथ कुल दस सीटें मिली थीं। वहीं 2014 में 42.3 प्रतिशत वोट के साथ सीटों की संख्या 70 के पार पहुंच गई। इसका एक बड़ा कारण था दूसरे दलों का अलग-अलग छिटकना। बसपा का सात प्रतिशत वोट कम रह गया था। मुस्लिम वोटर सपा के साथ गया। यानी बसपा, सपा और कांग्रेस के वोट अलग थलग होने के कारण बेअसर ही रहा। कैराना चुनाव ने यह समझा दिया कि इन वोटरों को यदि एक कर दिया जाए तभी भाजपा को रोका जा सकता है। रही सही कसर वेस्ट में बड़ी ताकत माने जाने वाले रालोद ने पूरी कर दी। वेस्ट यूपी की दस सीटों पर रालोद का बड़ा प्रभाव है। दलित, मुस्लिम केसाथ जाटों द्वारा रचा गया व्यूह तोड़ पाना मुश्किल होगा। चूंकि इस चुनाव में यह साफ हो गया है कि मुस्लिम एक साथ वोट करेगा तो परिणाम दूसरे के साथ मिलकर बदल ही देगा। चूंकि इस चुनाव में मुस्लिमों का उत्साह देखते ही बना।  

इस बार उल्टा
हिंदुत्व के नाम पर भाजपा पिछले चुनाव में मतदाताओं को साधती आई है। जाटों के अलावा दलितों ने भी पिछले चुनाव में भाजपा को वोट किया। चाहे कैराना पलायन का मुद्दा हो या सचिन गौरव हत्या का प्रकरण या फिर बिजनौर के पेद्दा कांड के आरोपियों को टिकट देना। इस तरह के मुद्दे इस चुनाव में गौण होकर रह गए।

शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें

https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें