कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव में इस बार महा गठबंधन ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जाट और मुस्लिम के बरसों पुराने फार्मूले को साधने की कोशिश है। इस फार्मूले में नया है तो यह कि सीट तो रालोद को दी गई है लेकिन प्रत्याशी सपा की है। रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ाने के पीछे मंशा दोनों समुदाय के बीच पैदा हुई खाई पाटने की है, साथ ही मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बिखरे जाट मुस्लिम समीकरण को जोड़ने की भी है। यह दांव कामयाब रहा तो 2019 में भाजपा के समीकरण गड़बड़ा जाएंगे, कामयाब नहीं हुआ तो गठबंधन दलों को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।
पहली बार ऐसा हुआ है कि पूरा विपक्ष एकजुट है।1952 से लेकर जितने भी चुनाव हुए, उनमें दोनों समुदाय के मतदाताओं ने एकतरफा मतदान किया है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जाट और मुस्लिम गठजोड़ वेस्ट यूपी में कारगर रहा है। 1989 और 1991 में भाजपा ने जाट मतदाताओं की बदौलत कैराना से जीत हासिल की थी। 1999 में अमीर आलम और 2004 में अनुराधा चौधरी की जीत का कारण भी जाट और मुस्लिम गठजोड़ ही रहा था। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट और मुस्लिमों के बीच तलवारें खींच गई थी। चौधरी अजित सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में दोनों समुदाय को एक साथ लाने का भरसक प्रयास किया था, मगर वह कामयाब नहीं हो पाए थे।
कैराना उप चुनाव को लेकर रालोद नेता जयंत चौधरी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती को यह समझाने में कामयाब रहे है कि जाट और मुस्लिम समीकरण बन जाए तो जीत की राह आसान हो जाएगी। यही वजह है कि तबस्सुम को रालोद के सिंबल पर चुनाव लड़ाने पर हामी भर दी।
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