फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कैराना उपचुनाव 2018: सियासत एक बार फिर इतिहास को दोहरा रही

Tue, 08 May 2018 11:16 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, आनंद प्रकाश, शामली
विज्ञापन
फाइल फोटो
विज्ञापन

कैराना में हिंदू गुर्जरों की कलस्यान चौपाल और मुस्लिम गुर्जरों का चबूतरा, इन्हीं के इर्द गिर्द कैराना की सियासत घूमती रही है। सियासत एक बार फिर इतिहास को दोहरा रही है। कैराना की राजनीति के धुर विरोधी हुकुम सिंह और मुनव्वर हसन जब आमने-सामने होते थे तो चौपाल और चबूतरा पर ही सारी रणनीति तय की जाती थी। इस बार इन्हीं दोनों परिवार की महिलाएं चुनावी मैदान में आमने सामने हैं। चुनाव तो दो जिलों की पांच विधान सभाओं में लड़ा जाएगा, लेकिन वार रूम चौपाल और चबूतरा ही होंगे।

विज्ञापन


कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा की तरफ से मृगांका सिंह प्रत्याशी हैं, तो गठबंधन की तरफ से तबस्सुम हसन प्रत्याशी घोषित हो चुकी हैं। तबस्सुम हसन रालोद के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगी। खास बात यह है कि मृगांका सिंह अपनी राजनीतिक सफर का दूसरा चुनाव लड़ रही हैं, तबस्सुम हसन भी दूसरी बार लोकसभा के चुनाव में दूसरी बार उतरी हैं। दोनों ही महिलाओं को राजनीतिक समझ विरासत में मिली है। हिन्दू गुर्जरों की निष्ठा कलस्यान चौपाल में है, तो मुसलिम गुर्जरों की चबूतरे पर। यह बात अलग है कि दोनों ही कलस्यान खाप से हैं। इन्हीं दोनों स्थानों पर कैराना की राजनीतिक केंद्रित रही। अब फिर से तय हो गया है कि कैराना की सियासत का रिमोट तो चौपाल और चबूतरे के हाथ में ही रहेगा।

पढ़ें : कैराना उपचुनाव: चंद्रशेखर 'रावण' के चुनावी मैदान में उतरने की चर्चा से खलबली

विज्ञापन
Trending Videos
विज्ञापन

पुराने फार्मूले पर नया दांव, कामयाब कितना, बताएगा परिणाम

फाइल फोटो
कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव में इस बार महा गठबंधन ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जाट और मुस्लिम के बरसों पुराने फार्मूले को साधने की कोशिश है। इस फार्मूले में नया है तो यह कि सीट तो रालोद को दी गई है लेकिन प्रत्याशी सपा की है। रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ाने के पीछे मंशा दोनों समुदाय के बीच पैदा हुई खाई  पाटने की है, साथ ही मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बिखरे जाट मुस्लिम समीकरण को जोड़ने की भी है। यह दांव कामयाब रहा तो 2019 में भाजपा के समीकरण गड़बड़ा जाएंगे, कामयाब नहीं हुआ तो गठबंधन दलों को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।

पहली बार ऐसा हुआ है कि पूरा विपक्ष एकजुट है।1952 से लेकर जितने भी चुनाव हुए, उनमें दोनों समुदाय के मतदाताओं ने एकतरफा मतदान किया है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जाट और मुस्लिम गठजोड़ वेस्ट यूपी में कारगर रहा है। 1989 और 1991 में भाजपा ने जाट मतदाताओं की बदौलत कैराना से जीत हासिल की थी। 1999 में अमीर आलम और 2004 में अनुराधा चौधरी की जीत का कारण भी जाट और मुस्लिम गठजोड़ ही रहा था। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट और मुस्लिमों के बीच तलवारें खींच गई थी। चौधरी अजित सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में दोनों समुदाय को एक साथ लाने का भरसक प्रयास किया था, मगर वह कामयाब नहीं हो पाए थे।

कैराना उप चुनाव को लेकर रालोद नेता जयंत चौधरी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती को यह समझाने में कामयाब रहे है कि जाट और मुस्लिम समीकरण बन जाए तो जीत की राह आसान हो जाएगी। यही वजह है कि तबस्सुम को रालोद के सिंबल पर चुनाव लड़ाने पर हामी भर दी।

शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें

https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें