लेकिन अब फिर से गठबंधन की कवायद चल रही है, कुछ स्थानीय नेताओं की माने तो बीते दो दिनों से फिर से विपक्षी एकता को मजबूत करने के प्रयास चल रहे हैं। सपा नेता सुधीर पंवार और रालोद जिलाध्यक्ष योगेंद्र सिंह चेयरमैन का कहना है कि भाजपा को परास्त करने के लिए एकजुटता तो जरूरी है। अभी गठबंधन पर कोई फैसला नहीं हुआ है, लेकिन बात खत्म भी नहीं हुई है। पार्टी नेतृत्व जो फैसला लेगा, पार्टी संगठन मजबूती से उस पर काम करेगा।
कैराना सीट पर रालोद की स्थिति
इस सीट पर रालोद भी कई चुनाव जीत चुका है। 2004 में इस सीट पर रालोद से अनुराधा चौधरी सांसद बनी थीं, तो 1999 में अमीर आलम रालोद से ही चुनाव जीते थे। वहीं, 1980 में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी कैराना सीट से सांसद चुनी गई थीं, जबकि 1977 में भारतीय लोकदल (बीएलडी) के टिकट पर चंदन सिंह सांसद चुने गए थे।
तो प्रत्याशी कौन होगा
जिस तरह की अटकलें चल रही हैं कि कैराना सीट के उपचुनाव में विपक्षी दलों का गठबंधन होगा, उसमें अहम सवाल यही है कि गठबंधन की तरफ से प्रत्याशी कौन होगा। अभी तक कैराना सीट पर समाजवादी पार्टी अपना दावा करती आई है, जबकि रालोद का भी यही प्रयास है कि गठबंधन में इस सीट से रालोद का प्रत्याशी उतारा जाए। अब देखना यह है कि यदि विपक्षी दलों का गठबंधन हुआ, तो उसमें प्रत्याशी किसे बनाया जाएगा।
बढ़ जाएगी भाजपा की चुनौती
कैराना 2014 में भाजपा ने इस सीट को जीता था, तब हुकुम सिंह 565909 वोट लेकर सांसद चुने गए थे, दूसरे नंबर पर सपा प्रत्याशी नाहिद हसन को 329081 वोट मिले थे। गत तीन फरवरी को हुकुम सिंह का निधन होने पर यह सीट रिक्त हुई। अब उपचुनाव में मृगांका सिंह को भाजपा की तरफ से प्रत्याशी बनाया जा रहा है, जिसके चलते भाजपा का यही प्रयास होगा कि कैराना सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा जाए।