सूबे का सियासी रण लोकसभा चुनाव से बेशक अलग था, लेकिन मतदाताओं का अंदाज नहीं बदला। यही नहीं, भाजपा की रणनीति हूबहू लोकसभा चुनाव जैसी ही रही। वेस्ट यूपी को ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला बनाकर भाजपा ने अपनी रणनीति तय की और सूबे में भगवा परचम लहराने में सफलता हासिल की। वर्ष-2014 में जिस तरह से पहले चरण में भाजपा की आंधी का संदेश पूरे प्रदेश में गया, उसी अंदाज में विधानसभा चुनाव में भी बड़ी जीत की लहर वेस्ट यूपी से ही निकली। लोकसभा चुनावों में मोदी ने मेरठ के जिस मैदान से जनता को संबोधित किया था, उसी मैदान से इस बार भी जनता को उसी अंदाज में लुभाया। कैराना पलायन को सामने रखते हुए भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को भी धार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यही वजह रही कि केंद्र सरकार के दो साल पूरे होने पर सहारनपुर की सभा और इसके बाद मेरठ की चुनावी रैली में मोदी के मंच से भाजपा नेताओं ने जय श्रीराम के भी नारे लगाए। वेस्ट यूपी की अधिकांश सीटों पर भाजपा की रणनीति के हिसाब से मुस्लिम भ्रम में रहे। लेकिन, जाट और गुर्जर समेत अन्य सभी जातियां भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो गईं।
बेशक कैराना हारे पर प्रयोग रहा सफल
दरअसल, भाजपा ने मुजफ्फरनगर दंगे के बाद हिंदू ध्रुवीकरण को बरकरार रखने के लिए कैराना पलायन को बड़ा मुद्दा बना लिया। इसी के सहारे भाजपा नेता अपने-अपने जिलों में अपराध को दूसरे समुदाय से जोड़कर ध्रुवीकरण का माहौल बनाते रहे। भाजपा बेशक कैराना सीट हार गई हो, लेकिन शामली और थानाभवन सीट पर जीत इसी मॉड्यूल के सीधे असर का नतीजा है। यही नहीं, कैराना पलायन को गरमाने के लिए संगीत सोम ने सरधना में पदयात्रा निकाली तो अमित शाह ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में यह मुद्दा उठाया। भाजपा ने कैराना के बाद कांधला समेत वेस्ट यूपी के दूसरे जिलों में भी कानून-व्यवस्था के मुद्दे को इसी अंदाज में धार दी। मेरठ में पैदल मार्च करने आए अमित शाह ने व्यापारी के बेटे की हत्या के विरोध में अपना पैदल मार्च रद्द करके इस संदेश को और मजबूती देने की कोशिश की थी। यही वजह रही कि नोटबंदी के कारण थोड़ी नाराजगी के बावजूद व्यापारी पूरी ताकत के साथ भाजपा के साथ रहा।
हिंदुत्व के नाम पर साधे जाट और गुर्जर
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट वोटर भाजपा के पाले में आ गया था। जाट मतदाताओं के साथ आने से फायदा यह मिला कि वह संख्या के साथ-साथ वेस्ट यूपी का एक प्रभावी तंत्र है। उसी के सहारे भाजपा ने विधानसभा चुनावों में भी हिंदुत्व के एजेंडे का धार देने की रणनीति बनाई। यही वजह थी कि बिजनौर में पेद्दा कांड के आरोपी मौसम चौधरी की पत्नी सुचि चौधरी को टिकट दिया गया। इसके अलावा बागपत लोकसभा सीट की पांचों विधानसभा सीटों पर जाट प्रत्याशी उतारे गए। आरक्षण को लेकर जाटों की नाराजगी को दूर करने के लिए जाट नेताओं की पूरी फौज उतार दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी बिजनौर रैली में चौ. चरण सिंह किसान कल्याण कोष स्थापित करने की ही घोषणा कर दी थी। जाट वोटरों के भाजपा में जाने का आलम यह रहा अपने गढ़ छपरौली में भी रालोद मुश्किल से जीत पाई। सिवालखास में रालोद का जाट प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहा। साथ ही पश्चिम में गुर्जर मतों की संख्या भी अच्छी-खासी है। लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव में भी गुर्जर मतदाताओं ने भाजपा का खुलकर साथ दिया। हस्तिनापुर की बड़ी जीत में सबसे अहम गुर्जर ही रहे।
दो साल दी गई चुनावी समीकरणों को धार
लोकसभा चुनावों के बाद से ही भाजपा ने पश्चिम के समीकरणों को धार देना शुरू कर दिया था। लव जेहाद और गोहत्या जैसे मामलों पर स्थानीय नेता मुखर रहे तो बड़े नेताओं ने भी पश्चिम को अपनी प्राथमिकता में रखा। केंद्र सरकार के दो साल पूरे होने पर सहारनपुर मेें प्रधानमंत्री का कार्यक्रम इसी का हिस्सा था। विधानसभा चुनाव के दौरान क्रांतिधरा मेरठ से रिश्ता जोड़ा तो यहां के उद्योगों का भी खासतौर पर जिक्र किया। बसपा के दलित-मुस्लिम समीकरण को तोड़ने के लिए भी पार्टी ने लगातार रणनीति बनाई। बड़े नेताओं के सपा सरकार पर हमलावर होने से मुस्लिम वोटर अलग-अलग जगहों पर बंटता रहा। कई जगहों पर वह बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों को छोड़कर वह सपा के गैर मुस्लिम प्रत्याशियों पर खुलकर गया। इस बंटवारे के कारण सपा और बसपा दोनों ने ही कई सीटें भाजपा की झोली में डाल दीं। मेरठ दक्षिण, थानाभवन, सिवालखास, बिजनौर सदर और बुढ़ाना जैसी कई सीटें हैं।