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Meerut News: जस्टिस श्रीवास्तव आयोग ने उठाए थे पीएसी की भूमिका पर सवाल

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मेरठ। मलियाना कांड की जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस जीएल श्रीवास्तव की अध्यक्षता में गठित जांच आयोग की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई। आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई होना तो दूर रिपोर्ट तक सार्वजनिक नहीं की गई। आयोग ने दंगे में पीएसी की भूमिका पर सवाल उठाए थे।
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मलियाना नरसंहार की जांच के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 27 मई 1987 को न्यायिक जांच की घोषणा की थी। 27 अगस्त को जस्टिस जीएल श्रीवास्तव को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने 31 जुलाई 1989 को सरकार को अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी। और ठंडे बस्ते में चली गई यह रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं हुई। हालांकि इसके कुछ अंश पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे, जिसमें पुलिस और पीएसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे।

आरोपी पक्ष के अधिवक्ता छोटे लाल बंसल बताते हैं कि पुलिस ने एफआईआर दर्ज कराने में ही खेल किया था। लोगों को झूठे आरोपी बनाया था। जिन 93 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी, उनमें से दो की मौत दंगे से सात साल पहले तो दो की मौत 10 साल पहले हो गई थी। पूरी एफआईआर तत्कालीन थानेदार ने अपने हिसाब से लिखाई थी। उसने मतदाता सूची ली और उसमें से 50 परिवारों के लोगों के नाम लिखा दिए, यह भी नहीं देखा कि जिनके नाम हैं, वह सभी जीवित भी हैं या नहीं। जो वादी बनाए गए, उन तक को नहीं पता था कि किस-किस के नाम लिखे गए हैं, एफआईआर उनसे एसओ ने अपने हिसाब से लिखवाई थी। कोर्ट में केस के न टिकने की यह भी बड़ी वजह रही। उन्होंने बताया कि इसके अलावा जो गवाह पेश किए गए, उनमें से भी छह लोगों ने यह गवाही दी कि नामजद किए गए लोग गोली चलाने वाले नहीं है, बल्कि गोली तो तत्कालीन प्रशासन के कहने पर पीएसी और पुलिसवालों ने चलाई थी, जिनसे लोगों की मौत हुई। जांच आयोग ने इन सब मामलों को संज्ञान में लिया था। मलियाना दंगे में 63 लोगों की मौत हो गई थी।
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आजादी के बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग हुई : विभूति नारायण
मेरठ में दो मोहल्ले थे हाशिमपुरा और मलियाना। यहां आसानी से पुलिस भी नहीं जा पाती थी। हिंदुओं ने इन्हें मिनी पाकिस्तान घोषित कर रखा था। पीएसी को कमांड कर रहे सब इंस्पेक्टर ने सोचा कि मिनी पाकिस्तान को कंट्रोल करने का एक ही तरीका है कि मुसलमानों के साथ सख्ती की जाए। देखिए कितनी भयानक सख्ती हुई। सैकड़ों लोगों को घर से निकाला गया और अनेक लोगों को मार दिया गया। लेखक होने के नाते मैंने पीएसी के अधिकारी से पूछा था कि जो लोग मारे गए थे किसी से पहले मिले थे, उसका जवाब था नहीं। लेखक होने के नाते मैं जानना चाहता था कि हत्यारा अपना शिकार क्यों चुनता है ?, मेरठ दंगे में आजादी के बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग हुई। दंगे कांग्रेस ने तो नहीं कराए थे, पर इतनी गंभीर घटना पर वह प्रतिक्रिया नहीं आई जो सरकार की तरफ से आनी चाहिए थी। - विभूति नारायण राय, साक्षात्कार में।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी पीआईएल
उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक विभूति नारायण राय और पीड़ित इस्माइल द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी। इस्माइल ने अपने परिवार के 11 सदस्यों को मलियाना में खो दिया था। मेरठ ट्रायल कोर्ट में मामले की पैरवी करने वाले एक वकील एमए राशिद ने एसआईटी द्वारा निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई और पीड़ितों के परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देने की मांग की थी।
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आज मिलेगी फैसले की कॉपी

एडीजीसी सचिन मोहन गुप्ता ने बताया कि मलियाना नरसंहार कांड में जो फैसला शनिवार को आया है, उसकी कॉपी सोमवार को मिलेगी। फैसले के बाद कॉपी रिविजन के लिए चली गई थी। रविवार को कचहरी में छुट्टी थी। फैसला पढ़ने के बाद ही पता चल पाएगा कि कोर्ट ने क्या टिप्पणी की है और कितने पेज का फैसला है ? उन्होंने कहा कि हो सकता है फैसले के काफी पेज हों।
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